डिजिटल शहडोल में साइबर ठगों की नई सेंध,सेफ क्लिक' एवं जागरूकता ही है बचाव का एकमात्र रास्ता-प्रशांत द्विवेदी
Junaid khan - शहडोल। जिला आज तेजी से डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ रहा है। ग्रामीण अंचलों से लेकर शहरी इलाकों तक, हर हाथ में स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुंच ने जीवन को बेहद आसान बना दिया है। बैंकिंग,शॉपिंग से लेकर सरकारी योजनाओं का लाभ अब एक क्लिक पर उपलब्ध है। लेकिन तकनीक के इस उजाले के पीछे साइबर अपराध का एक ऐसा गहरा अंधेरा भी पनप रहा है, जो सीधे आम जनता की मेहनत की कमाई पर डाका डाल रहा है। हाल ही में जिले में सामने आए साइबर ठगी के नए और हैरान करने वाले मामलों ने यह साफ कर दिया है कि अब डिजिटल सुरक्षा को लेकर लापरवाही बरतने का समय खत्म हो चुका है। यदि हम पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो शहडोल सहित पूरे मध्य प्रदेश में साइबर अपराधों का ग्राफ बेहद डरावनी गति से बढ़ा है। राष्ट्रीय और प्रांतीय साइबर अपराध विश्लेषण के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 और 2021 के कोविड-19 दौर के बाद जब डिजिटल लेन-देन में अचानक उछाल आया, तब शुरुआती तौर पर साधारण एटीएम पिन फ्रॉड, लॉटरी और नकली बैंक अधिकारी बनकर फोन पर ठगी करने के मामले दर्ज किए गए थे। लेकिन इसके ठीक बाद, वर्ष 2022 और 2023 के दौरान पूरे राज्य में दर्ज साइबर मामलों में 50 प्रतिशत से अधिक की भारी वृद्धि देखी गई। इस अवधि में शहडोल अंचल के युवाओं को मुख्य रूप से पार्ट टाइम जॉब और टेलीग्राम आधारित टास्क के जरिए भारी मुनाफे का लालच देकर करोड़ों रुपये की चपत लगाई गई। यह खतरा यहीं नहीं रुका। इसके बाद के वर्षों में साइबर ठगों का जाल और अधिक हिंसक और व्यापक हो गया। आंकड़ों के मुताबिक, इस दौर में अकेले मध्य प्रदेश में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की साइबर ठगी की शिकायतें सामने आईं, जिसमें सबसे चिंताजनक बात यह रही कि प्रभावित होने वाले पीड़ितों में 65% से 76% तक केवल युवा और कॉलेज जाने वाले छात्र-छात्राएं शामिल थे। इन युवाओं को सोशल मीडिया पर हनीट्रैप, ब्लैकमेलिंग और अश्लीलता के जाल में फंसाकर मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया गया। वहीं आज के वर्तमान परिदृश्य में ठगों ने बेहद आधुनिक हथियार अपना लिए हैं, जहां बिना किसी ओटीपी के, सिर्फ एक दोषपूर्ण एपीके फाइल या फर्जी डिजिटल शादी का कार्ड व्हाट्सएप पर भेजकर चंद सेकंड में पूरा फोन हैक कर लिया जाता है। वर्तमान में अपराधियों के ये बदलते हथकंडे सीधे हमारे सामाजिक और पारिवारिक जीवन पर चोट कर रहे हैं। बुढ़ार, सोहागपुर और जैतपुर जैसे क्षेत्रों से सामने आई हालिया घटनाएं बताती हैं कि कैसे एक अनजान लिंक पर किया गया सिर्फ एक गलत क्लिक, मोबाइल का पूरा नियंत्रण हैकर्स को सौंप देता है। हाल ही में बुढ़ार पुलिस द्वारा फेसबुक और इंस्टाग्राम पर अश्लीलता फैलाने वाले और फर्जी प्रोफाइल बनाकर ब्लैकमेल करने वाले गिरोहों पर की गई सख्त कार्रवाई यह साबित करती है कि यह जंग अब केवल पैसों की नहीं, बल्कि समाज की सुरक्षा और प्रतिष्ठा की भी है। इस गंभीर चुनौती के बीच, शहडोल पुलिस प्रशासन की तत्परता और दूरदर्शिता एक बड़ी राहत बनकर सामने आई है। जिला पुलिस द्वारा पुलिस अधीक्षक के मार्गदर्शन में जिले के सभी 14 थानों में विशेष साइबर डेस्क की शुरुआत करना एक अत्यंत सराहनीय और युगांतकारी कदम है। पहले दूरदराज के ग्रामीणों को साइबर ठगी की शिकायत दर्ज कराने के लिए जिला मुख्यालय की दौड़ लगानी पड़ती थी, जिससे कीमती समय बर्बाद होता था। अब थानों में ही 'ऑन द स्पॉट' तकनीकी मदद मिलने से ठगी गई रकम को समय रहते बैंकों में फ्रीज कराने (ब्लॉक करने) की संभावना काफी बढ़ गई है। इसके साथ ही, पुलिस का 'सेफ क्लिक 2.0' अभियान जनता को जागरूक करने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। परंतु, केवल पुलिस की कार्रवाई या थानों में डेस्क खोल देने से इस अदृश्य दुश्मन को नहीं हराया जा सकता। साइबर सुरक्षा की पहली और सबसे मजबूत दीवार स्वयं नागरिक हैं। जब तक हम अपने डिजिटल व्यवहार को लेकर सजग नहीं होंगे, तब तक यह खतरा बना रहेगा। हमें यह समझना होगा कि इंटरनेट की दुनिया में हर चमकती हुई चीज या लुभावना ऑफर एक जाल हो सकता है। अनजान नंबरों से आए लिंक्स पर क्लिक न करना, किसी अपरिचित ऐप को मोबाइल में इंस्टॉल न करना और अपनी गोपनीय वित्तीय जानकारी किसी से साझा न करना ही हमारी असली सुरक्षा है। इस डिजिटल युग में 'सेफ क्लिक' (सुरक्षित क्लिक) एवं जागरूकता ही बचाव का एकमात्र और सबसे अचूक रास्ता है। यदि अनजाने में कोई ठगी हो भी जाए, तो बिना डरे या शरमाए 'गोल्डन ऑवर' (शुरुआती एक घंटे) के भीतर राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या तुरंत अपने नजदीकी थाने की साइबर डेस्क से संपर्क करें। समय आ गया है कि शहडोल का हर नागरिक डिजिटल रूप से साक्षर होने के साथ-साथ डिजिटल रूप से सतर्क भी बने, ताकि हम एक सुरक्षित और समृद्ध डिजिटल समाज का निर्माण कर सकें।डिजिटल होना समय की मांग है और शहडोल का बदलता स्वरूप इस प्रगति का गवाह है, लेकिन इस विकास पथ पर सुरक्षा की अनदेखी आत्मघाती साबित हो सकती है। साइबर अपराधियों का कोई चेहरा नहीं होता और न ही उनकी कोई भौगोलिक सीमा होती है; वे केवल हमारी एक छोटी सी लापरवाही का इंतजार करते हैं। ऐसे में पुलिस प्रशासन की मुस्तैदी और तकनीकी चौकसी अपनी जगह सराहनीय है, लेकिन अंतिम सुरक्षा कवच हमारे अपने विवेक के हाथ में है। तकनीक के इस दौर में हमें 'डिजिटल साक्षर' होने के साथ-साथ 'डिजिटल सतर्क' भी बनना होगा। जब जिले का हर नागरिक किसी भी अनजान लिंक या लुभावने संदेश को देखकर रुकना, सोचना और जांचना सीख जाएगा, तभी हम इस अदृश्य खतरे को जड़ से मिटा पाएंगे। याद रखिए, इंटरनेट की इस आभासी दुनिया में आपकी सजगता ही आपकी सबसे बड़ी जमापूंजी है। सतर्क शहडोल, सुरक्षित कल,जागरूकता ही है, हर साइबर ठगी का हल। आपका साइबर दोस्त प्रशांत द्विवेदी शहडोल।
