OPD पर पड़ रहा सीधा असर, हर महीने 12 से ज्यादा गंभीर मरीज ऑपरेशन के लिए मेडिकल कॉलेज रेफर होने को मजबूर,39 में से दर्जनों पद खाली
Junaid Khan - शहडोल। जिले के सबसे बड़े शासकीय कुशाभाऊ ठाकरे जिला चिकित्सालय में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत दिनों-दिन चिंताजनक होती जा रही है। एक तरफ शासन और स्वास्थ्य महकमा बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने के लंबे-चौड़े दावे कर रहा है, तो दूसरी तरफ हकीकत यह है कि बीते महज तीन महीनों के भीतर चार विशेषज्ञ चिकित्सकों के इस्तीफे देने से पूरे अस्पताल की व्यवस्था चरमरा गई है। अस्पताल की ओपीडी (OPD) में प्रतिदिन 1000 से अधिक असहाय मरीज दूर-दराज के ग्रामीण व आदिवासी इलाकों से इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, लेकिन डॉक्टरों की लगातार घटती संख्या के कारण उन्हें समुचित उपचार नहीं मिल पा रहा है। जिला अस्पताल में विशेषज्ञों के कुल 39 स्वीकृत पद हैं, लेकिन स्थिति इतनी दयनीय है कि पहले से ही कई पद खाली चल रहे थे और महज 22 डॉक्टर ही पदस्थ थे। अब चार और वरिष्ठ विशेषज्ञों के इस्तीफे के बाद यह संख्या घटकर बेहद कम रह गई है। यही नहीं, मेडिकल ऑफिसर के 21 स्वीकृत पदों में से भी केवल 15 कार्यरत हैं, जबकि 6 डॉक्टर लगातार अनुपस्थित चल रहे हैं। ऐसे में बचे हुए सीमित डॉक्टरों पर काम का असहनीय दबाव बढ़ गया है, जिससे अस्पताल की साख और मरीजों की जान दोनों पर भारी संकट मंडरा रहा है। अस्थि रोग और पैथोलॉजी विभाग पर सबसे ज्यादा मार, रेफर का दर्द झेलने को मजबूर गरीब मरीज। अस्पताल में विशेषज्ञों के इस्तीफों और अनुपस्थिति का सबसे भयानक असर हड्डी रोग (ऑर्थोपेडिक्स) और पैथोलॉजी विभाग पर पड़ा है। अस्थि रोग विभाग में रोजाना 30 से 35 गंभीर मरीज और सड़क दुर्घटनाओं में घायल लोग पहुंचते हैं। सामान्य प्राथमिक उपचार तो किसी तरह हो जाता है, लेकिन दो प्रमुख विशेषज्ञों में से डा. अरविंद आंबेडकर के इस्तीफा देने और डा. हर्ष श्रीवास्तव के लगातार अनुपस्थित रहने से गंभीर मरीजों का ऑपरेशन पूरी तरह ठप हो गया है। इसी तरह पैथोलॉजी विभाग के विशेषज्ञ डा. शमीम अहमद के इस्तीफे के बाद जांच रिपोर्ट तैयार करने का पूरा प्रभार सिविल सर्जन को खुद संभालना पड़ रहा है। कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की डा. अमरीन के इस्तीफे ने भी स्वास्थ्य सुविधाओं को गहरा झटका दिया है। विशेषज्ञ डॉक्टरों और आधुनिक संसाधनों के अभाव में गंभीर मरीजों को मजबूरी में मेडिकल कॉलेज भेजा जा रहा है। हर महीने करीब 10 से 12 मरीजों को केवल ऑपरेशन न हो पाने के कारण रेफर करना पड़ता है। जिला अस्पताल के चक्कर काटने के बाद मेडिकल कॉलेज जाने से गरीब और ग्रामीण मरीजों का समय व पैसा दोनों बर्बाद हो रहा है, वहीं गंभीर स्थिति में समय पर इलाज न मिलना कई बार मरीजों के जीवन पर भारी पड़ रहा है। प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल, सिविल सर्जन बोलीं- सीमित संसाधनों में भी बेहतर सेवाएं देने का प्रयास जारी शहडोल जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में निजी अस्पतालों का खर्च उठाना आम जनता के बस की बात नहीं है, जिसके कारण अधिकांश आबादी पूरी तरह से सरकारी जिला अस्पताल पर ही निर्भर है। स्थानीय नागरिकों और समाजसेवी संगठनों ने मध्य प्रदेश सरकार व उच्च प्रशासनिक अधिकारियों से मांग की है कि खाली पड़े पदों पर तत्काल प्रभाव से विशेषज्ञ चिकित्सकों की नई पदस्थापना की जाए, ताकि मरीजों को जिले में ही संपूर्ण इलाज व ऑपरेशन की सुविधा मिल सके। मामले में प्रशासनिक पक्ष रखते हुए जिला अस्पताल की सिविल सर्जन डा. शिल्पी सराफ का कहना है कि "चिकित्सकों और विशेषज्ञों की कमी निश्चित रूप से एक बड़ी चुनौती है, लेकिन इसके बावजूद उपलब्ध डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ दिन-रात मेहनत करके मरीजों को बेहतर से बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। मरीजों का दबाव बहुत ज्यादा है और उस अनुपात में डॉक्टरों की कमी बनी हुई है, जिसकी जानकारी शासन व वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी जा चुकी है।" अब देखना यह होगा कि जनस्वास्थ्य से जुड़े इस संवेदनशील मामले पर शासन-प्रशासन कितनी मुस्तैदी से संज्ञान लेता है।
