जिला अस्पताल में ‘नशे का अड्डा’सुरक्षा पर हर माह 4 लाख खर्च, फिर भी शराब-गुटखा का खुला खेल फायर अलार्म तक बने पीकदान

जिला अस्पताल में ‘नशे का अड्डा’सुरक्षा पर हर माह 4 लाख खर्च, फिर भी शराब-गुटखा का खुला खेल फायर अलार्म तक बने पीकदान


Junaid khan - शहडोल। जिला चिकित्सालय, जिसे मरीजों के इलाज और सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद केंद्र माना जाता है, वहीं अब लापरवाही और अव्यवस्था की मिसाल बनता जा रहा है। प्रतिबंधों के तमाम दावों के बीच अस्पताल परिसर में शराबखोरी और गुटखा सेवन खुलेआम जारी है। हाल ही में किए गए एक स्टिंग में जो तस्वीर सामने आई, उसने न सिर्फ अस्पताल प्रबंधन बल्कि जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल की दीवारें जगह-जगह गुटखा और पान की पीक से सनी हुई हैं। कई कोनों में शराब की खाली बोतलें, डिस्पोजल गिलास, नमकीन के पैकेट और अन्य सामग्री के ढेर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यहां नियमित रूप से नशे की महफिलें सजती हैं। शाम ढलते ही परिसर असामाजिक तत्वों के लिए सुरक्षित ठिकाने में तब्दील हो जाता है। फायर अलार्म बॉक्स बने ‘पीकदान’सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि कई फायर अलार्म बॉक्स के अंदर गुटखा की पीक और खाली पाउच ठूंसे हुए मिले। आपातकालीन सुरक्षा उपकरणों की इस हालत ने अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यदि किसी आकस्मिक स्थिति में अलार्म सिस्टम प्रभावित हुआ तो बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता। अन्य तकनीकी उपकरणों में भी गुटखा के पाउच और गंदगी भरी मिली, जो रखरखाव की पोल खोलती है। सुरक्षा पर लाखों खर्च, नतीजा शून्य जिला अस्पताल और उसके परिसर की सुरक्षा के लिए 25 सुरक्षाकर्मी अलग-अलग शिफ्ट में तैनात हैं। इन पर हर माह लगभग 4 लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इसके बावजूद प्रतिबंधित सामग्री परिसर में कैसे पहुंच रही है, यह बड़ा प्रश्न है। क्या सुरक्षा व्यवस्था सिर्फ कागजों तक सीमित है? क्या निगरानी तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है?

नेत्र विभाग के पास सजती ‘शराब की महफि 

स्टिंग के दौरान यह भी सामने आया कि नेत्र विभाग के पास स्थित धर्मशाला में असामाजिक तत्व बैठकर शराबखोरी ही नहीं, बल्कि संदिग्ध गतिविधियों की योजना तक बनाते हैं। यह स्थिति मरीजों, उनके परिजनों और अस्पताल स्टाफ की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है। अस्पताल जैसा संवेदनशील स्थल यदि इस तरह की गतिविधियों का केंद्र बन जाए, तो कानून-व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। फाइलों में प्रतिबंध, जमीनी हकीकत अलग अस्पताल प्रशासन समय-समय पर परिसर में नशा प्रतिबंध और स्वच्छता को लेकर सख्ती के दावे करता रहा है। लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों की हवा निकालती नजर आ रही है। साफ-सफाई, निगरानी और सुरक्षा की व्यवस्थाएं कागजों में भले दुरुस्त दिखाई दें, मगर हकीकत में हालात बदतर हैं। जवाबदेही तय करने की मांग जिला अस्पताल जैसी महत्वपूर्ण संस्था में यदि इस स्तर की लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई तय होनी चाहिए। नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने मांग उठाई है कि अस्पताल परिसर में तत्काल सघन जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कठोर कदम उठाए जाएं। साथ ही सुरक्षा व्यवस्था की पुनर्समीक्षा कर निगरानी तंत्र को प्रभावी बनाया जाए। अस्पताल वह जगह है जहां लोग जीवन बचाने की उम्मीद लेकर आते हैं। यदि वही परिसर असामाजिक तत्वों का अड्डा बन जाए, तो यह न सिर्फ व्यवस्था की विफलता है बल्कि समाज के लिए भी गंभीर चेतावनी है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस खुलासे के बाद कितनी तेजी और सख्ती से कदम उठाता है।

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