दो माह में आठ बाघों की मौत से हड़कंप

हाई कोर्ट के निर्देश पर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व ने सौंपी स्टेटस रिपोर्ट, 25 मार्च को अगली सुनवाई


Junaid khan - शहडोल। जबलपुर प्रदेश में बाघों की लगातार हो रही मौतों ने एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीते लगभग दो माह के भीतर आठ बाघों की मौत का मामला सामने आने के बाद हाई कोर्ट के निर्देश पर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर ने विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इस मामले में अगली सुनवाई 25 मार्च को निर्धारित की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार 21 नवंबर से 2 फरवरी के बीच कुल आठ बाघों की मृत्यु दर्ज की गई। इनमें से चार बाघों की मौत टाइगर रिजर्व क्षेत्र के भीतर हुई, जबकि चार अन्य की मृत्यु सामान्य वन क्षेत्र में बताई गई है। रिजर्व के अंदर हुई मौतों को प्राकृतिक कारणों से जोड़कर देखा गया है, वहीं बाहरी क्षेत्रों में हुई चार मौतों में करंट लगने की बात सामने आई है।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि मृत बाघों के अवशेष सुरक्षित पाए गए, जिससे शिकार की आशंका को प्राथमिक स्तर पर नकारा गया है। हालांकि अदालत ने याचिकाकर्ताओं को रिपोर्ट पर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं, जिससे स्पष्ट है कि न्यायालय इस पूरे मामले को गंभीरता से देख रहा है। कोर और बफर क्षेत्र में विद्युत लाइनों की स्थिति भी जांच के दायरे में है। संवेदनशील इलाकों में बिजली लाइनों के सुदृढ़ीकरण और वन्यजीव सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर विद्युत विभाग को पत्राचार किए जाने की जानकारी दी गई है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि खुले तार और असुरक्षित विद्युत ढांचा वन्यजीवों के लिए बड़ा खतरा साबित हो रहा है। प्रदेश में बाघों की मौत के आंकड़े भी चिंताजनक हैं। पिछले कुछ वर्षों में लगातार बाघों की असामयिक मृत्यु दर्ज की गई है। वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि टाइगर स्टेट का दर्जा रखने वाले मध्यप्रदेश में इस तरह की घटनाएं संरक्षण तंत्र की कमजोरी को उजागर करती हैं। उनका आरोप है कि कई मामलों में बाघों की मौत रहस्यमय परिस्थितियों में होती है और ठोस जवाबदेही तय नहीं हो पाती। याचिका में यह भी कहा गया है कि बाघों के आपसी संघर्ष, क्षेत्रीय दबाव और मानवीय दखल जैसी वजहों की गहन जांच जरूरी है। साथ ही रिजर्व क्षेत्रों में निगरानी तंत्र को और मजबूत करने, बिजली लाइनों को सुरक्षित बनाने तथा शिकार की संभावनाओं पर कड़ी नजर रखने की मांग उठाई गई है। फिलहाल सभी की निगाहें 25 मार्च को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि संरक्षण व्यवस्था को लेकर आगे क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे। बाघों की लगातार हो रही मौतों ने यह साफ कर दिया है कि जंगलों में सुरक्षा के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी कम करना अब बेहद जरूरी हो गया है।

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