सब कुछ चमक रहा है! शहडोल जिला अस्पताल में कायाकल्प टीम की दिव्य दृष्टि
Junaid Khan - शहडोल। कहते हैं कि अगर देखने वाली नज़र बदल जाए तो दुनिया भी बदल जाती है। शायद यही चमत्कार शहडोल जिला अस्पताल में हुआ, जब कायाकल्प टीम निरीक्षण करने पहुँची। अस्पताल वही था, दीवारें वही थीं, मरीज वही थे, शिकायतें भी वही थीं लेकिन अचानक सब कुछ “कायाकल्पित दिखने लगा। कमाल की बात यह रही कि टीम को अस्पताल में कोई विशेष कमी नजर ही नहीं आई। अब सवाल यह नहीं है कि अस्पताल में कमियाँ थीं या नहीं, सवाल यह है कि देखने का चश्मा कैसा था।
कायाकल्प या मायाजाल
सरकारी योजनाओं में कायाकल्प शब्द का मतलब होता है अस्पताल को साफ-सुथरा, व्यवस्थित और मरीजों के अनुकूल बनाना। लेकिन शहडोल में यह शब्द शायद “कागजों पर कायाकल्प” बनकर रह गया है। क्योंकि स्थानीय लोगों की मानें तो अस्पताल की वास्तविकता कुछ और ही कहानी कहती है। मरीज बताते हैं कि वार्डों में बेड की कमी है, दवाइयाँ कई बार बाहर से खरीदनी पड़ती हैं, और डॉक्टरों की उपलब्धता अक्सर “किस्मत” पर निर्भर करती है। लेकिन कायाकल्प टीम की रिपोर्ट ने मानो इन सब बातों को अदृश्य बना दिया,क्या यह कोई जादू था
या फिर निरीक्षण के दिन अस्पताल ने खुद को बॉलीवुड सेट में बदल लिया था।
निरीक्षण से पहले की ‘महासफाई’
सरकारी निरीक्षणों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि उनके आने से पहले ही अस्पताल का कायाकल्प शुरू हो जाता है। अचानक दीवारें धुल जाती हैं, टूटी कुर्सियाँ गायब हो जाती हैं, और स्टाफ की संख्या भी चमत्कारिक रूप से बढ़ जाती है।कहते हैं कि निरीक्षण से पहले अस्पताल में सफाई का ऐसा महाअभियान चला कि खुद स्वच्छता अभियान भी शर्मा जाए। शायद यही वजह रही कि टीम को हर जगह चमक ही चमक नजर आई।लेकिन व्यंग्य यहीं से शुरू होता है,क्या निरीक्षण एक दिन की सजावट देखने के लिए होता है या पूरे साल की वास्तविक स्थिति समझने के लिए....?
मरीजों की आवाज़ बनाम रिपोर्ट की खामोशी
अस्पताल में इलाज कराने आए कई लोगों का कहना है कि उन्हें घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है। कभी डॉक्टर मिलते है कभी नहीं मिलते, कभी मशीनें खराब रहती हैं, तो कभी जांच की तारीख इतनी दूर मिलती है कि बीमारी इंतजार करते-करते खुद थक जाए। लेकिन रिपोर्ट में संभवतःसब कुछ “संतोषजनक” बताया गया।ऐसा लगता है जैसे मरीजों की आवाज़ और रिपोर्ट के शब्दों के बीच कोई अनुवादक खो गया हो।
व्यवस्था या व्यवस्थापन का नाटक
कायाकल्प टीम का काम होता है कमियों को पहचानना ताकि सुधार हो सके। लेकिन अगर कमियाँ दिखें ही नहीं तो सुधार कैसे होगा...! यह ठीक वैसा ही है जैसे डॉक्टर मरीज को बिना जांच किए पूरी तरह स्वस्थ घोषित कर दे।शायद टीम को अस्पताल में वही दिखा जो उन्हें दिखाया गया।कुछ कर्मचारियों का मानना है कि निरीक्षण के दौरान सब कुछ मैनेज किया गया था। अगर यह सच है तो यह सिर्फ अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विडंबना है।
साफ दीवारें,गंदे सवाल
निरीक्षण में साफ दीवारें और चमकते फर्श जरूर दिखाई दिए होंगे, लेकिन क्या किसी ने यह पूछा कि मरीजों को समय पर इलाज मिल रहा है या नहीं...?
क्या किसी ने यह जांचा कि गरीब मरीजों को मुफ्त सेवाएँ वास्तव में मिल रही हैं या नहीं...? क्या किसी ने यह देखा कि स्टाफ की कमी का असर मरीजों पर कैसा पड़ता है...?अगर ये सवाल नहीं पूछे गए, तो कायाकल्प सिर्फ पेंट और पोछे तक सीमित रह गया।
कमियां जो कायाकल्प टीम कों दिखी
सबसे हास्यापद बात तो ये रही की जिला अस्पताल में बड़ी बड़ी कमियों कों नजरअंदाज करते हुए टीम कों पंखों पर धूल और ड्रेसिंग मे कमी ही दिखाई दी। मरीजों कों साफ पानी देने वाली आरो मशीन जो कई महीनो से खराब है और दरवाजे के अंदर बंद है शायद दिखाई नहीं दी।मरीज जहां अस्वच्छ पानी पीने के लिए मजबूर है वही महंगी बोतलों का पानी खरीदकरमरीज के परिजनों की कमर टूट रही है...!
कागजों का स्वर्ग,जमीन की हकीकत
सरकारी रिपोर्टें अक्सर इतनी सुंदर होती हैं कि उन्हें पढ़कर लगता है जैसे अस्पताल किसी आदर्श दुनिया का हिस्सा हो। लेकिन जमीन पर वही पुरानी कहानी दोहराई जाती है।यह विरोधाभास सिर्फ शहडोल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की पहचान बन चुका है।
सबसे दिलचस्प बात
यह है कि अगर कायाकल्प टीम को सच में कोई कमी नहीं मिली, तो इसका मतलब दो ही हो सकते हैं। या तो अस्पताल सच में परफेक्ट है, या फिर कमियाँ देखने की क्षमता कहीं रास्ते में छूट गई। अगर अस्पताल इतना ही आदर्श है तो फिर मरीजों की शिकायतें क्यों खत्म नहीं हो रही....? क्या मरीज झूठ बोल रहे हैं, या रिपोर्ट सच नहीं कह रही....?
जनता का सवाल
क्या निरीक्षण सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है...?अगर निरीक्षण का उद्देश्य सुधार नहीं बल्कि पुरस्कार हासिल करना बन जाए, तो व्यवस्था धीरे-धीरे आत्मसंतुष्टि की बीमारी का शिकार हो जाती है।
सिस्टम की ‘सेल्फी’
आजकल हर जगह फोटो और वीडियो का दौर है। निरीक्षण के दौरान भी शायद कई तस्वीरें ली गई होंगी। चमकते वार्ड, मुस्कुराते कर्मचारी और व्यवस्थित फाइलें...?लेकिन क्या किसी ने उन मरीजों की तस्वीर ली जो इलाज के इंतजार में बैठे थे....?कायाकल्प शायद अस्पताल की सेल्फी बन गया है। जिसमें फिल्टर इतना मजबूत है कि कमियाँ दिखती ही नहीं। आखिरी सवाल सुधार या सिर्फ प्रमाणपत्र सबसे गंभीर सवाल यही है कि क्या कायाकल्प का उद्देश्य वास्तव में सुधार है या सिर्फ प्रमाणपत्र हासिल करना...? अगर टीम कमियाँ नहीं बताएगी तो सुधार कैसे होगा...? और अगर सुधार नहीं होगा, तो मरीजों की उम्मीदें कब पूरी होंगी..अदृश्य कमियों का अस्पताल
शहडोल जिला अस्पताल में कायाकल्प टीम की नजर से सब कुछ परफेक्ट दिख सकता है, लेकिन सच यही है कि वास्तविकता शायद इतनी चमकदार नहीं है।अस्पताल की असली कायाकल्प तब होगी जब रिपोर्ट और जमीन की सच्चाई एक जैसी दिखे।जब निरीक्षण सिर्फ एक दिन की सजावट नहीं, बल्कि सालभर की व्यवस्था को समझने का प्रयास बने।और जब मरीजों की आवाज़ को रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण लाइन माना जाए।तब तक के लिए। शहडोल का अस्पताल शायद वही रहेगा, जहाँ कमियाँ मौजूद हैं… लेकिन देखने वालों को शायद दिखाई नहीं देता। जिला अस्पताल के तीन महारथी...! (1) डॉ शिल्पी सराफ (सिविल सर्जन) - सिविल सर्जन के रूप में इनका नियंत्रण स्टाफ पर शून्य है। नर्सों और वार्ड बॉय का व्यवहार ग्रामीण मरीजों के साथ ऐसा है जैसे वे कोई खैरात मांग रहे हों....! (2) पूजा सोनी सहायक प्रबंधक (प्रशासन) - सूत्र बताते है की मैडम कभी भी समय पर नहीं आती है।और आने के बाद अपने एसी चेंबर में दाखिल होने के बाद बाहर नहीं निकलती है। बड़ी किस्मत वाला ही इनके दर्शन कर पाता है...! (3) डॉ पुनीत श्रीवास्तव (आरएमओ) कहने कों तो डॉक्टर साहब आईएमओ है पर उनकी अस्पताल में चलती नहीं है छोटे-छोटे काम के लिए इन्हें खुद यहां से वहां चक्कर लगाना पड़ता है। अब इनसे मरीज या स्टाफ क्या उम्मीद करें...!

