बाल कल्याण समिति का नोटिस, तीन दिन में मांगा जवाब किशोर न्याय अधिनियम का हवाला, परीक्षा से वंचित होने पर भी उठे सवाल
भाजपा के दबाव के कारण, लाचार प्रशासन की वजह से नाबालिग हुआ परीक्षा से वंचित-अजय अवस्थी
Junaid khan - शहडोल। जिले की राजनीति में उस समय नया मोड़ आ गया जब कक्षा 12वीं के एक नाबालिग छात्र को धरना-प्रदर्शन में शामिल किए जाने के मामले में जिला कांग्रेस कमेटी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। मामले को संज्ञान में लेते हुए बाल कल्याण समिति ने किशोर न्याय अधिनियम का हवाला देते हुए जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष को नोटिस जारी कर तीन दिवस के भीतर स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। समिति द्वारा जारी नोटिस में स्पष्ट रूप से पूछा गया है कि नाबालिग छात्र को विरोध प्रदर्शन में किन परिस्थितियों में शामिल किया गया, क्या उसकी सुरक्षा के लिए कोई ठोस योजना तैयार की गई थी, तथा आयोजन के दौरान उसकी देखरेख की क्या व्यवस्था थी। समिति ने यह भी जानना चाहा है कि यदि नाबालिग को संभावित गिरफ्तारी या अन्य कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा, तो उसकी शैक्षणिक और मानसिक सुरक्षा को लेकर क्या कदम उठाए गए थे। यह पूरा घटनाक्रम अब कानूनी, राजनीतिक और नैतिक बहस का विषय बन गया है। बाल अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम के तहत किसी भी नाबालिग को जोखिमपूर्ण या टकराव की स्थिति में डालना अत्यंत गंभीर विषय है।
मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान हुआ था प्रदर्शन
उल्लेखनीय है कि 08 फरवरी को डॉ. मोहन यादव के धनपुरी दौरे के दौरान जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री के काफिले को काले झंडे दिखाने का प्रयास किया था। इस दौरान पुलिस ने करीब 40 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया था, जिनमें एक नाबालिग छात्र भी शामिल था। हिरासत में लिए गए तीन व्यक्तियों जिनमें नाबालिग भी शामिल था को बाद में बुढ़ार जेल भेज दिया गया। जेल में निरुद्ध रहने के कारण उक्त छात्र अपनी परीक्षा में शामिल नहीं हो सका, जिससे उसके शैक्षणिक भविष्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। यही तथ्य अब पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना रहा है। सूत्रों के अनुसार, छात्र की 10 फरवरी को 12वीं की परीक्षा का पहला पेपर था। परीक्षा से वंचित होने की घटना ने अभिभावकों और आमजन में भी चिंता की लहर पैदा कर दी है।
जन आक्रोश रैली के बाद बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी
मामले को लेकर जिला कांग्रेस कमेटी ने प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की उपस्थिति में शुक्रवार को जन आक्रोश रैली निकालकर सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराया था। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि पुलिस ने अनावश्यक कठोरता बरती और शांतिपूर्ण विरोध को दबाने का प्रयास किया। हालांकि, बाल कल्याण समिति की कार्रवाई ने अब पूरा फोकस इस प्रश्न पर ला खड़ा किया है कि क्या किसी राजनीतिक दल को नाबालिगों को ऐसे आंदोलनों में शामिल करने की अनुमति दी जा सकती है, और यदि हां, तो उनकी सुरक्षा व अधिकारों की जिम्मेदारी कौन वहन करेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में एक मिसाल बन सकता है। यदि समिति की जांच में लापरवाही या कानून का उल्लंघन पाया गया, तो संबंधित जिम्मेदारों पर विधिक कार्रवाई भी संभव है।
जनहित के मुद्दों से ध्यान भटकाने हेतु भेजे गए नोटिस की कांग्रेस ने की निंदा
भाजपा के दबाव के कारण, लाचार प्रशासन की वजह से नाबालिग हुआ परीक्षा से वंचित–अजय अवस्थी
शहडोल। जिला कांग्रेस कमेटी शहडोल के जिलाध्यक्ष अजय अवस्थी ने बाल कल्याण समिति द्वारा जारी नोटिस पर कड़ी आपत्ति दर्ज करते हुए कहा है कि, यह कार्यवाही वास्तविक जनसमस्याओं से ध्यान भटकाने का एक सुनियोजित प्रयास है। जिलाध्यक्ष श्री अवस्थी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी लगातार जिले में शुद्ध पेयजल संकट, बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, अवैध उत्खनन एवं प्रशासनिक लापरवाही जैसे गंभीर मुद्दों को उठाती रही है। इन ज्वलंत समस्याओं का समाधान देने के बजाय विपक्ष की आवाज को दबाने के उद्देश्य से नोटिस जारी करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। श्री अवस्थी ने कहा भारतीय जनता पार्टी के दबाव मे प्रशासन ने हठधर्मिता का परिचायक देते हुए नाबालिग को परीक्षा के एक दिन पहले रिहा नहीं किया, जबकी पुलिस विभाग एवं जेल प्रबंधन को इस बात से सबूत सहित, अवगत कराया जा चुका था की नाबालिग की 10 फरवरी को 12 वीं की परीक्षा का पहला पेपर है। लेकिन प्रशासन के द्वेष पूर्ण रवैए के कारण नाबालिग को पेपर के दिन ही रिहा किया गया जिससे समय आभाव के कारण वो परीक्षा देने से वंचित रह गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस का प्रत्येक आंदोलन संवैधानिक दायरे में, शांतिपूर्ण एवं जनहित में किया जाता है। यदि प्रशासन के पास जनता की समस्याओं का समाधान नहीं है, तो वह नोटिस और दबाव की राजनीति का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता। जिलाध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस पार्टी सदैव कानून का सम्मान करती है, लेकिन किसी भी प्रकार की दमनात्मक कार्रवाई से डरने वाली नहीं है। यदि प्रशासन को वास्तव में चिंता है, तो उसे जिले की मूलभूत समस्याओं पर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए, न कि जनआंदोलनों को कमजोर करने का प्रयास करना चाहिए। उक्त जानकारी जिला कांग्रेस कमेटी शहडोल के मुख्य प्रवक्ता पीयूष शुक्ला ने प्रदान की। कानूनी और नैतिक सवालों के घेरे में राजनीति यह घटनाक्रम केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि बाल अधिकारों, अभिभावकीय जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि नाबालिगों की किसी भी सार्वजनिक गतिविधि में भागीदारी उनकी सुरक्षा, शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए ही सुनिश्चित की जानी चाहिए। अब निगाहें जिला कांग्रेस कमेटी के जवाब पर टिकी हैं। समिति के समक्ष तीन दिन के भीतर प्रस्तुत किए जाने वाले स्पष्टीकरण के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। जिले की राजनीति में उठे इस विवाद ने एक व्यापक बहस छेड़ दी है। क्या राजनीतिक विरोध के लिए नाबालिगों की भागीदारी उचित है, या यह उनके अधिकारों का उल्लंघन है? आने वाले दिनों में इस प्रश्न का उत्तर न केवल प्रशासन और राजनीतिक दलों के लिए,बल्कि समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण दिशा तय।

