रात के अंधेरे में पोकलेन मशीनों से अवैध उत्खनन, सैकड़ों ट्रैक्टर-डंपर से हो रही रेत की तस्करी प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
Junaid Khan - शहडोल। जिले की नदियां इन दिनों रेत माफियाओं के निशाने पर हैं। रात के अंधेरे में पोकलेन मशीनों और सैकड़ों ट्रैक्टर-डंपरों की मदद से खुलेआम अवैध रेत उत्खनन किया जा रहा है। प्रशासन की सख्ती के दावों के बावजूद यह काला कारोबार लगातार फल-फूल रहा है, जिससे न केवल सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है बल्कि नदियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ता जा रहा है।
रात होते ही शुरू हो जाता है रेत का काला कारोबार जैसे ही सूरज ढलता है, कई नदी घाटों पर रेत माफियाओं की गतिविधियां तेज हो जाती हैं। पोकलेन मशीनें नदी के बीच उतरकर गहराई तक खुदाई करती हैं और ट्रैक्टर-डंपर के जरिए रेत को अलग-अलग स्थानों तक पहुंचाया जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई इलाकों में पूरी रात ट्रैक्टरों की आवाजाही बनी रहती है, जिससे ग्रामीणों की नींद तक प्रभावित होती है।
निर्माण कार्यों की बढ़ती मांग का फायदा
शहरों और कस्बों में तेजी से बढ़ रहे निर्माण कार्यों के कारण रेत की मांग भी लगातार बढ़ रही है। इसी का फायदा उठाकर रेत माफिया अवैध खनन को बढ़ावा दे रहे हैं। एक ट्रैक्टर रेत की कीमत हजारों रुपये तक पहुंच जाती है और यदि एक रात में सैकड़ों ट्रैक्टर रेत निकलती है तो यह कारोबार लाखों से करोड़ों रुपये तक पहुंच जाता है।
सरकार को करोड़ों का राजस्व नुकसान
अवैध रेत उत्खनन का सबसे बड़ा नुकसान सरकारी खजाने को हो रहा है। नियमानुसार खनन होने पर सरकार को रॉयल्टी और टैक्स के रूप में भारी राजस्व मिलता है, लेकिन चोरी-छिपे रेत निकालने से यह पूरा पैसा माफियाओं की जेब में चला जाता है। इससे विकास कार्यों के लिए मिलने वाली राशि पर भी असर पड़ता है। नदियों का अस्तित्व खतरे में पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार लगातार हो रहा अवैध उत्खनन नदियों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रहा है। जरूरत से ज्यादा रेत निकालने से नदी का जलस्तर गिरने लगता है और आसपास के क्षेत्रों में जल संकट की स्थिति बन सकती है। इसके साथ ही नदी किनारे की भूमि कटाव और जैव विविधता पर भी गंभीर असर पड़ता है।
विरोध करने वालों को मिलती है धमकियां
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि रेत के इस अवैध कारोबार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को अक्सर धमकियों का सामना करना पड़ता है। कई जगहों पर पत्रकारों और जागरूक नागरिकों को भी डराने-धमकाने की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे साफ है कि यह कारोबार अब संगठित अपराध का रूप लेता जा रहा है।
प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतना बड़ा अवैध कारोबार चल कैसे रहा है। यदि प्रशासन चाहे तो अवैध खनन को रोका जा सकता है, लेकिन अक्सर कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है। कभी-कभार कुछ वाहनों पर कार्रवाई होती है, लेकिन बड़े स्तर पर चल रहे इस नेटवर्क तक प्रशासन की पकड़ नहीं पहुंच पाती।
जरूरत है बड़े अभियान की
विशेषज्ञों का मानना है कि रेत माफियाओं पर अंकुश लगाने के लिए केवल छोटी-मोटी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसके लिए लगातार निगरानी, तकनीकी व्यवस्था और सख्त कानूनी कार्रवाई की जरूरत है। साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करनी होगी, तभी इस काले कारोबार पर प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी।
नदियां बचेंगी या माफिया जीतेंगे?
आज सवाल केवल अवैध रेत खनन का नहीं है, बल्कि नदियों के भविष्य और पर्यावरण की सुरक्षा का भी है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को सूखी और बर्बाद नदियां ही देखने को मिलेंगी। अब यह प्रशासन, सरकार और समाज सभी के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।
