जन-सुनवाई में पहुंची शिकायत
न्यायालय ने नियुक्ति प्रक्रिया को बताया ‘कानून के विरुद्ध’, फिर भी पद पर बने रहने से प्रशासन पर सवाल प्रकरण ने पकड़ा तूल
Junaid Khan - शहडोल। 21 अप्रैल 2026 शहडोल जिले में शिक्षा विभाग से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर के स्पष्ट आदेश के बावजूद एक अधिकारी को पद से न हटाने पर प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। यह मामला जन-सुनवाई में शिकायत के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना तक की बात कही गई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह पूरा मामला WP15342/2023 में पारित निर्णय दिनांक 17 फरवरी 2026 तथा समीक्षा याचिका RP581/2026 के निर्णय दिनांक 06 अप्रैल 2026 से जुड़ा हुआ है। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि District Education Officer द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इंटरव्यू में उपस्थित होने हेतु केवल एक व्यक्ति Brijeshdhar Dwivedi ने ही प्रमाणपत्र एवं सूचना प्रस्तुत की थी। इसके विपरीत, Respondent No.5 (Arvind Kumar Pandey) के संबंध में न्यायालय ने पाया कि उन्होंने डायरेक्टोरेट कार्यालय में इंटरव्यू में भाग लेने हेतु कोई भी सूचना या प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किया। ऐसे में उनकी नियुक्ति प्रक्रिया संदिग्ध एवं अपारदर्शी प्रतीत हुई। न्यायालय की सख्त टिप्पणी
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि Respondent No.5 (Arvind Kumar Pandey) की APC पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया “bad in law” यानी कानून के विरुद्ध है। चूंकि वे APC पद पर विधिवत कार्यरत ही नहीं हैं, इसलिए उन्हें ADPC का अतिरिक्त प्रभार देना भी नियम विरुद्ध है। इसके बावजूद, उन्हें APC एवं ADPC Ramsa Shahdol (M.P.) के पद पर बनाए रखना गंभीर प्रश्न खड़े करता है। आदेशों के बावजूद कार्रवाई नहीं,शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि कलेक्टर शहडोल द्वारा पूर्व में जारी आदेश क्रमांक /शिक्षा/स्था./2025/607 दिनांक 29.04.2025 के तहत भी नियमों के विपरीत अतिरिक्त प्रभार दिया गया। भोपाल स्थित लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा भी वर्ष 2016-17 में जारी आदेश (क्रमांक CPI/RMSA/प्रतिनियुक्ति/1793 दिनांक 05.10.2016) का हवाला देते हुए नियमों के उल्लंघन की बात कही गई है। इसके बावजूद, संबंधित अधिकारी को पद से नहीं हटाया गया, जिससे पूरे मामले को लेकर प्रशासनिक निष्क्रियता और मिलीभगत के आरोप लग रहे हैं। वित्तीय निर्णयों पर भी उठे सवाल। शिकायतकर्ता ने गंभीर आरोप लगाया है कि 17 फरवरी 2026 के बाद, जब न्यायालय ने प्रतिनियुक्ति को अवैध माना, उसके बावजूद संबंधित अधिकारी द्वारा कार्यालयीन वित्तीय कार्यों में कई नोटशीट एवं चेकों पर हस्ताक्षर किए गए। यह स्थिति सरकारी कार्यप्रणाली की पारदर्शिता और वैधता पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। जन-सुनवाई में उठी मांग शिकायतकर्ता अजय कुमार मोटवानी (निवासी न्यू बस स्टैंड रोड, शहडोल) ने जन-सुनवाई में प्रस्तुत आवेदन में मांग की है। श्री अरविंद कुमार पाण्डेय को तत्काल प्रभाव से APC/ADPC पद से हटाया जाए उन्हें उनके मूल पद उच्च माध्यमिक शिक्षक पर वापस भेजा जाए और पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए। प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती। यह मामला केवल एक नियुक्ति का नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेशों के पालन और प्रशासनिक जवाबदेही का बन चुका है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सीधे-सीधे उच्च न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आ सकता है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर शिकायत पर क्या कार्रवाई करता है। क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। निष्कर्ष: शहडोल में शिक्षा विभाग से जुड़ा यह मामला अब प्रशासनिक पारदर्शिता, न्यायालय के आदेशों की गरिमा और सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता की अग्नि परीक्षा बन गया है। जन-सुनवाई में उठी यह आवाज आने वाले दिनों में बड़ा प्रशासनिक मुद्दा बन सकती है।
