सोन नदी बनी जहर की धारा: प्रदूषण पर खामोशी से भड़का जनाक्रोश, जिम्मेदारों पर उठे बड़े सवाल

सोन नदी बनी जहर की धारा: प्रदूषण पर खामोशी से भड़का जनाक्रोश, जिम्मेदारों पर उठे बड़े सवाल


Junaid Khan - शहडोल। जिले की जीवनरेखा कही जाने वाली सोन नदी आज खुद ही जीवन के लिए खतरा बनती जा रही है। नदी के बढ़ते प्रदूषण ने न केवल पर्यावरण को झकझोर दिया है, बल्कि हजारों लोगों के स्वास्थ्य, खेती और भविष्य पर भी गहरा संकट खड़ा कर दिया है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि लगातार शिकायतों, सबूतों और जनआक्रोश के बावजूद जिम्मेदार विभागों की चुप्पी इस पूरे मामले को और गंभीर बना रही है। स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि ओरिएंट पेपर मिल से निकलने वाला केमिकल युक्त गंदा पानी बिना पर्याप्त ट्रीटमेंट के सीधे नालों के जरिए सोन नदी में बहाया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है, जिससे यह आशंका गहराती जा रही है कि कहीं न कहीं जिम्मेदारों की मिलीभगत भी इस पूरे मामले में शामिल हो सकती है। यह कोई एक-दो दिन का मामला नहीं, बल्कि वर्षों से चल रही एक गंभीर समस्या है। क्षेत्र के लोगों ने कई बार प्रशासन और संबंधित विभागों को अवगत कराया, लेकिन हर बार आश्वासन के अलावा कुछ भी ठोस नहीं हुआ। हालात ऐसे हैं कि अब लोगों का भरोसा सिस्टम से उठता नजर आ रहा है और गुस्सा धीरे-धीरे जनआंदोलन का रूप लेने लगा है। मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब हाल ही में सामने आई तस्वीरों और वीडियो ने सच्चाई को उजागर कर दिया। इन दृश्यों में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह जहरीला पानी पाइप और नालों के जरिए सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है। यह सिर्फ एक तकनीकी लापरवाही नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ खुला खिलवाड़ प्रतीत होता है।

इस पूरे मामले को सामने लाने में सामाजिक कार्यकर्ता अवधेश पाण्डेय की भूमिका भी अहम रही है। उन्होंने न सिर्फ सबूत जुटाए, बल्कि प्रशासन को भी कई बार इस गंभीर मुद्दे से अवगत कराया। अब उन्होंने मांग की है कि इस मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए ताकि सच्चाई सामने आ सके। सबसे ज्यादा सवाल मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका को लेकर उठ रहे हैं। जब लगातार शिकायतें और प्रमाण सामने हैं, तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों? क्या निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित है या फिर कहीं न कहीं सिस्टम की नाकामी इस पूरे मामले को बढ़ावा दे रही है? ग्रामीणों का कहना है कि अगर समय रहते सख्त कार्रवाई की जाती, तो आज हालात इतने भयावह नहीं होते। लेकिन अब स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि नदी का पानी उपयोग करने लायक भी नहीं बचा है। कई जगहों पर बदबू, रंग बदलता पानी और मछलियों की मौत जैसे संकेत साफ तौर पर प्रदूषण की गंभीरता को दिखा रहे हैं। सोन नदी पर निर्भर सैकड़ों गांवों के लिए यह संकट किसी आपदा से कम नहीं है। पीने के पानी से लेकर खेती और पशुपालन तक, हर क्षेत्र में इसका असर देखने को मिल रहा है। यदि जल्द ही इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह स्वास्थ्य आपदा का रूप ले सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि केमिकल युक्त पानी के लगातार संपर्क में रहने से त्वचा रोग, जलजनित बीमारियां और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं। वहीं, खेतों में ऐसे पानी के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित हो रही है, जिससे किसानों की आजीविका पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। अवधेश पाण्डेय ने मांग की है कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो। जांच के दौरान वीडियोग्राफी अनिवार्य की जाए और इसमें स्थानीय नागरिक, जनप्रतिनिधि, पत्रकार और फैक्ट्री प्रबंधन सभी की मौजूदगी सुनिश्चित की जाए, ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या लीपापोती की संभावना खत्म हो सके। अब पूरा जिला और संभाग इस मुद्दे पर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर नजर टिकाए बैठा है। सवाल सिर्फ एक नदी का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य का है। यदि इस बार भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह मामला बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है। क्या जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे, या सोन नदी यूं ही जहर बनकर बहती रहेगी?

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