नदियों से दिन-रात निकल रही रेत, कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति…सिस्टम की चुप्पी ने बढ़ाया खेल
Junaid Khan - शहडोल। जिले में रेत का अवैध कारोबार अब खुलकर बेलगाम हो चुका है। जेैतपुर और बुढार क्षेत्र अवैध खनन के नए गढ़ बनते जा रहे हैं, जहां फर्जी टीपी (ट्रांजिट पास) के सहारे रेत का काला कारोबार दिन-रात जारी है। नदियों का सीना चीरकर निकाली जा रही रेत न सिर्फ पर्यावरण के लिए खतरा बन रही है, बल्कि शासन को करोड़ों के राजस्व का भी नुकसान पहुंचा रही है। सूत्रों की मानें तो जिले में वैध खदानों का संचालन ठप होने के बाद से अवैध खनन ने चरम रूप ले लिया है। जेैतपुर और बुढार थाना क्षेत्र में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर बताई जा रही है, जहां रेत माफिया बेखौफ होकर दिन-रात नदी से रेत निकालकर परिवहन कर रहे हैं। आरोप है कि छत्तीसगढ़ की फर्जी टीपी के सहारे यह पूरा नेटवर्क संचालित हो रहा है। नदियों से लगातार निकल रही रेत को ट्रैक्टर, डंपर और अन्य वाहनों के जरिए विभिन्न स्थानों तक पहुंचाया जा रहा है। जेैतपुर की कुनुक नदी और गोहपार क्षेत्र में पिछले एक महीने से अवैध खनन की गतिविधियां तेज हो गई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि रात तो छोड़िए, दिन में भी बड़े पैमाने पर रेत निकाली जा रही है, जिससे नदी का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा है। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि इस पूरे अवैध कारोबार में रसूखदार और प्रभावशाली माफियाओं की संलिप्तता है, जिनके कारण प्रशासनिक कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाती है। खनिज विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि लगातार शिकायतों के बावजूद ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। बताया जा रहा है कि फर्जी टीपी के जरिए रेत को वैध दिखाकर जिले में ही नहीं, बल्कि बाहर भी सप्लाई किया जा रहा है। यह नेटवर्क इतना मजबूत हो चुका है कि कार्रवाई की भनक लगते ही वाहन चालक रास्ता बदल लेते हैं या फिर रेत को अन्य स्थानों पर खपा दिया जाता है। इससे प्रशासन की पकड़ कमजोर पड़ती नजर आ रही है। खनिज विभाग द्वारा बीच-बीच में छापामार कार्रवाई जरूर की जाती है, लेकिन यह कार्रवाई माफियाओं के बढ़ते हौसलों पर कोई असर नहीं डाल पा रही। हालात यह हैं कि विभागीय अमले में भी डर का माहौल बताया जा रहा है, जिससे प्रभावी कार्रवाई करने में हिचकिचाहट देखी जा रही है। पुलिस पर भी संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना पुलिस की जानकारी के इतने बड़े स्तर पर अवैध परिवहन संभव नहीं है। हालांकि पुलिस स्तर से इन आरोपों को सिरे से खारिज किया जाता रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि इस तरह का अंधाधुंध खनन नदियों के प्राकृतिक स्वरूप को नष्ट कर रहा है। इससे जलस्तर गिरने का खतरा बढ़ रहा है और आने वाले समय में जल संकट गहरा सकता है। इसके अलावा नदी किनारे बसे गांवों में कटाव और दुर्घटनाओं का जोखिम भी बढ़ गया है। राजस्व के मोर्चे पर भी सरकार को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। वैध खनन बंद होने के बावजूद अवैध कारोबार से माफिया करोड़ों की कमाई कर रहे हैं, जबकि शासन को इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा। यह स्थिति सीधे तौर पर सिस्टम की नाकामी को उजागर करती है। यदि समय रहते इस अवैध कारोबार पर लगाम नहीं लगाई गई, तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं। जरूरत है कि प्रशासन, खनिज विभाग और पुलिस मिलकर संयुक्त अभियान चलाएं और इस काले कारोबार की जड़ों तक पहुंचकर कड़ी कार्रवाई करें, ताकि नदियों का अस्तित्व बचाया जा सके और कानून का राज कायम रह सके।
