पीडब्ल्यूडी में 'कमीशनखोरी' का नंगा नाच: 30% की 'कट' नहीं दी तो लौटा दिया जनता की गाढ़ी कमाई का 60 लाख रुपया

पीडब्ल्यूडी में 'कमीशनखोरी' का नंगा नाच: 30% की 'कट' नहीं दी तो लौटा दिया जनता की गाढ़ी कमाई का 60 लाख रुपया 


Junaid Khan - शहडोल। सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं, इसका जीवंत प्रमाण लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) में देखने को मिल रहा है। विकास कार्यों के दावों के बीच 'कमीशन' का ऐसा खेल चल रहा है कि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने से इनकार करने पर ठेकेदारों का भुगतान तक रोक दिया जाता है। ताज़ा मामला शहडोल कलेक्टर की चौखट तक पहुँच गया है, जहाँ एक ठेकेदार ने विभाग के बाबू पर 30 प्रतिशत कमीशन मांगने और अभद्रता करने के सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

ईमानदार ठेकेदार को 'सिस्टम'की सजा 

मेसर्स सत्येंद्र कंस्ट्रक्शन के प्रोपराइटर सत्येंद्र सिंह बघेल ने कलेक्टर को लिखे पत्र में विभाग की कार्यप्रणाली की बखिया उधेड़ कर रख दी है। आरोप है कि पीडब्ल्यूडी कार्यालय में पदस्थ सहायक ग्रेड-3 उमाकांत मिश्रा द्वारा बिलों के भुगतान के बदले खुलेआम 30 प्रतिशत कमीशन की मांग की जा रही है। भ्रष्टाचार की यह मांग केवल एक फाइल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यवस्थित वसूली का हिस्सा प्रतीत होती है। जब ठेकेदार ने इस अवैध मांग के आगे झुकने से इनकार किया, तो न केवल उसका भुगतान रोका गया, बल्कि उसके साथ दुर्व्यवहार भी किया गया।

कमीशन की भेंट चढ़ा सरकारी बजट,60 लाख सरेंडर

भ्रष्टाचार का सबसे काला पक्ष यह है कि व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण जनहित के कार्यों का पैसा वापस लौट गया। पिछले वित्तीय वर्ष 2025-26 के मार्च महीने में कमीशन का तालमेल न बैठने के कारण लगभग 60 लाख रुपये की राशि शासन को वापस सरेंडर कर दी गई। यह न केवल विभाग की लापरवाही है, बल्कि जिले के विकास के साथ किया गया एक बड़ा विश्वासघात है। वर्तमान में भी स्थिति जस की तस बनी हुई है, जहाँ बाबू द्वारा स्पष्ट शब्दों में कहा जा रहा है कि "कमीशन दो, तभी भुगतान होगा।

छोटे कर्मचारियों की आड़ में 'बड़े हाथ'? 

हैरानी की बात यह है कि आरोपी कर्मचारी इसे अपनी मजबूरी बता रहे हैं। उमाकांत मिश्रा का कहना है कि वे केवल एक छोटे कर्मचारी हैं और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन कर रहे हैं। यह बयान विभाग के भीतर एक बड़े नेक्सस (गठजोड़) की ओर इशारा करता है। सवाल यह उठता है कि क्या वाकई यह वसूली केवल एक बाबू के स्तर पर हो रही है, या इसके तार ऊपर तक जुड़े हुए हैं? प्रशासन के लिए यह जांच का विषय है कि 'निर्देश' देने वाले वे चेहरे कौन हैं, जिनके इशारे पर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है।

कलेक्टर की निष्पक्षता पर टिकी नजरें

पीडब्ल्यूडी के भीतर चल रहे इस '30% सिंडिकेट' ने सरकार की छवि को भी दांव पर लगा दिया है। एक तरफ जहां सरकार भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ शहडोल पीडब्ल्यूडी में कमीशन न मिलने पर काम रोकने और पैसे लौटाने की हिम्मत दिखाई जा रही है। अब गेंद कलेक्टर के पाले में है। क्या इस मामले में केवल दिखावटी जांच होगी, या फिर उन चेहरों को बेनकाब किया जाएगा जो विकास की गंगा में अपना हाथ धो रहे हैं? जिले भर की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि क्या भ्रष्टाचार के इन खिलाड़ियों पर कोई कड़ी कार्रवाई होगी।

मुख्य बिंदु जो इस खबर को मजबूती देते हैं

सटीक आरोप: 30% कमीशन की मांग का सीधा जिक्र। वित्तीय नुकसान: 60 लाख रुपये सरेंडर होने की बात जनता को झकझोरने के लिए काफी है। प्रशासनिक चुनौती: 'बाबू' के बयान के जरिए उच्च अधिकारियों को भी घेरे में लिया गया है। जनहित: खबर में विकास कार्यों के रुकने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया है।

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