आदेश के बाद भी नहीं थमी मनमानी: बंधवाबड़ा पंचायत में प्रशासनिक प्रक्रिया पर उठे सवाल
Junaid Khan - शहडोल। शहडोल जिले की जनपद पंचायत अंतर्गत आदर्श ग्राम पंचायत बंधवाबड़ा एक बार फिर प्रशासनिक कार्यप्रणाली और स्थानीय प्रभाव के कारण चर्चा में है। ग्राम चंदनिया खुर्द, जिसने लोकसभा चुनाव 2024 में 100% मतदान कर जिले में मिसाल पेश की थी, आज उसी पंचायत में लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत बंधवाबड़ा के निर्वाचित सरपंच बोरे लाल कोल को कथित शिकायतों के आधार पर हटाते हुए जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) द्वारा 26 दिसंबर 2025 को कार्रवाई की गई थी। इसके बाद 12 जनवरी 2026 को डल्लू बैगा को अस्थायी कार्यवाहक सरपंच नियुक्त कर सभी पदीय दायित्व सौंप दिए गए। मामला जब कमिश्नर न्यायालय, शहडोल पहुंचा, तो 6 अप्रैल 2026 को महत्वपूर्ण निर्णय सामने आया। कमिश्नर ने सीईओ जिला पंचायत द्वारा पारित आदेश को निरस्त करते हुए अपील स्वीकार की और निर्वाचित सरपंच बोरे लाल कोल को पुनः सभी अधिकार और दायित्व सौंपने के निर्देश दिए। यह आदेश लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली के रूप में देखा गया। लेकिन यहीं से शुरू हुई नई विवाद की कहानी।
कमिश्नर के स्पष्ट आदेश के बावजूद, 21 अप्रैल 2026 को कार्यवाहक सरपंच रहे डल्लू बैगा द्वारा जिला पंचायत सीईओ को एक शिकायत पत्र सौंपा गया, जिसमें ग्राम पंचायत सचिव अमोल सिंह पर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए। जबकि 6 अप्रैल का आदेश संबंधित कार्यालयों तक पहुंच चुका था और निर्वाचित सरपंच द्वारा भी विधिवत सूचना दी जा चुकी थी।
इसके अगले ही दिन, 22 अप्रैल 2026 को जिला पंचायत सीईओ द्वारा सचिव अमोल सिंह को पत्र क्रमांक 1289 जारी कर कारण बताओ नोटिस थमा दिया गया। नोटिस में आंगनबाड़ी भवन निर्माण में मजदूरी भुगतान लंबित रहने, वेंडरों के भुगतान में देरी, आवास योजनाओं के आईडी-पासवर्ड संबंधी लापरवाही तथा फाइल प्रबंधन में कमी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। साथ ही मध्यप्रदेश ग्राम पंचायत सेवा (आचरण) नियम 1998 और पंचायत सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियम 1999 के तहत इसे दंडनीय माना गया। सीईओ द्वारा सचिव को 24 अप्रैल 2026 तक जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया, अन्यथा एकपक्षीय कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई।
सबसे अहम सवाल यहीं खड़ा होता है...
जब कमिश्नर का आदेश 6 अप्रैल को जारी हो चुका था और कार्यवाहक सरपंच का अधिकार स्वतः समाप्त हो गया था, तो उसके द्वारा की गई शिकायत पर इतनी त्वरित कार्रवाई कैसे और क्यों की गई। इसके बाद सचिव अमोल सिंह ने पंचायत की संपूर्ण जिम्मेदारी उसी कार्यवाहक सरपंच को सौंप दी, जिसका कार्यकाल न्यायालयीन आदेश के अनुसार समाप्त हो चुका था। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक भ्रम को दर्शाती है, बल्कि आदेशों के अनुपालन पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। बंधवाबड़ा पंचायत का यह पूरा प्रकरण प्रशासनिक समन्वय की कमी और स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमिका को उजागर करता है। एक ओर जहां लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधि को न्यायालय से राहत मिलती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर आदेशों के पालन में अनदेखी दिखाई देती है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाता है,ताकि लोकतंत्र की मूल भावना कायम रह सके।
