₹18.35 लाख के भुगतान के लाले; अब ठेकेदार सपरिवार करेगा आमरण अनशन
Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल संभाग में सरकारी रसूख और प्रशासनिक तानाशाही का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने समूचे सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ जिला परिवहन अधिकारी (RTO) कार्यालय और अधिकारी के निजी आवास पर लाखों रुपये का काम कराने के बाद एक स्थानीय छोटे ठेकेदार को उसकी गाढ़ी कमाई के भुगतान के लिए दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर दिया गया है। मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि पद के दुरुपयोग और सीधे-सीधे आर्थिक शोषण का नजर आ रहा है। वार्ड नंबर 10 निवासी स्थानीय ठेकेदार शिवम गुप्ता ने अब न्याय की आस में सीधे जिला कलेक्टर के द्वार पर दस्तक दी है और चेतावनी दी है कि यदि उनका हक नहीं मिला, तो वे सिस्टम की इस बेरुखी के खिलाफ आरटीओ दफ्तर के ठीक सामने सपरिवार आमरण अनशन पर बैठने को बाध्य होंगे।
23 दिसंबर से 10 फरवरी तक पसीना बहाया, पर बिल के नाम पर मिला 'धोखा'
शिकायत के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया। आरटीओ कार्यालय में पुट्टी और इमल्शन (पेंट) के कार्य के लिए बकायदा कोटेशन प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया था। इसके बाद अधिकारी के निर्देश पर ठेकेदार शिवम गुप्ता ने भारी-भरकम पूंजी और मजदूरों को लगाकर 23 दिसंबर से लेकर 10 फरवरी 2026 तक पूरी निष्ठा के साथ काम को मुकम्मल किया। सरकारी दफ्तर चमचमाने लगा, लेकिन जब इस पसीने की कीमत यानी कुल 18,35,819 रुपये (जीएसटी सहित) का वैध बिल भुगतान के लिए पेश किया गया, तो विभाग के अधिकारियों के तेवर पूरी तरह बदल गए। महीनों से यह बिल डंप पड़ा है और अब अधिकारी महोदया द्वारा फोन तक उठाना बंद कर दिया गया है, जो सीधे तौर पर एक आम नागरिक और व्यवसायी के साथ मानसिक और आर्थिक क्रूरता की पराकाष्ठा है।
बिचौलिए का 'खेल' और निजी आवास पर 'मुफ्त' काम कराने का संगीन आरोप इस पूरे मामले का सबसे स्याह और चौंकाने वाला पहलू वह है, जहाँ सरकारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि विभागीय अधिकारियों ने उन्हें अरविंद सिंह नामक एक रसूखदार बिचौलिए से मिलवाया। आरोप के मुताबिक, इसी माध्यम का इस्तेमाल कर मैडम (आरटीओ) के निजी आवास पर भी पुताई का काम 'मुफ्त' में करवा लिया गया। यह सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है कि एक तरफ सरकारी बजट से दफ्तर का काम कराया जाए और उसी के रसूख के दम पर अपने निजी बंगले को भी चमका लिया जाए। आज जब ठेकेदार अपने जायज हक की मांग कर रहा है, तो विभागीय स्तर पर टाल-मटोल का खेल खेला जा रहा है, जिससे इस पूरे सिंडिकेट की मिलीभगत की बू आ रही है।
अधिकारी का अजीबोगरीब दावा
कुछ लोगों ने मदद से किया था काम', खड़े हुए कई कानूनी सवाल जब इस पूरे महाघोटाले और आर्थिक शोषण पर आरटीओ अनपा खान से पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने आरोपों को सिरे से नकारते हुए बेहद हैरान करने वाला बयान दिया। उन्होंने कहा कि वे शिकायतकर्ता को जानती तक नहीं हैं और जहाँ तक काम की बात है, वह "कुछ लोगों द्वारा की गई मदद से हुआ था।" एक जिम्मेदार श्रेणी-एक के अधिकारी का यह बयान अपने आप में कानून और वित्तीय नियमों का मखौल उड़ाता है। सवाल यह उठता है कि क्या कोई सरकारी कार्यालय "किसी की निजी मदद" से पेंट कराया जा सकता है? क्या इसके लिए कोई टेंडर या वित्तीय स्वीकृति नहीं थी? और यदि मदद थी, तो उस 'मददगार' का नाम उजागर क्यों नहीं किया जा रहा? यह गोलमोल जवाब साफ तौर पर सच को दबाने और अपनी जवाबदेही से भागने की एक नाकाम कोशिश प्रतीत होता है।
कलेक्टर की चौखट पर न्याय की गुहार, एक सप्ताह में आर-पार की लड़ाई का अल्टीमेटम इस प्रशासनिक तानाशाही से तंग आकर आखिरकार पीड़ित ठेकेदार शिवम गुप्ता ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। कलेक्टर को सौंपे गए शिकायती पत्र में उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि उनके पास अब आत्मदाह या अनशन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। उन्होंने प्रशासन को एक सप्ताह (7 दिन) का कड़ा अल्टीमेटम दिया है कि यदि उनके वैध 18 लाख से अधिक के बिल का भुगतान सुनिश्चित नहीं कराया गया, तो वे अपने पूरे परिवार (जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं) के साथ आरटीओ कार्यालय के सामने आमरण अनशन पर बैठ जाएंगे। अब देखना यह है कि शहडोल का जिला प्रशासन इस खुले भ्रष्टाचार और एक परिवार को भुखमरी की कगार पर धकेलने वाले अधिकारियों पर क्या दंडात्मक कार्रवाई करता है, या फिर इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। संपादकीय टिप्पणी: एक तरफ सरकार 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' और छोटे कारोबारियों को संरक्षण देने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ शहडोल का यह आरटीओ दफ्तर सिस्टम के मुंह पर तमाचा मार रहा है। एक ठेकेदार का ₹18 लाख दबाकर बैठ जाना और फिर मुकर जाना, सीधे तौर पर प्रशासनिक डकैती है। हमारे समाचार पत्र की इस खोजी रिपोर्ट के बाद अब देखना होगा कि शासन के उच्च बैठे नुमाइंदे इस गंभीर आर्थिक अनियमितता पर कब जांच की गाज गिराते हैं।
