सड़क पर दौड़ते मौत के सौदागर,परिवहन विभाग की 'फिटनेस' पर भ्रष्टाचार का 'सर्टिफिकेट

कबाड़ हो चुकीं निजी बसों में यात्रियों का सफर भगवान भरोसे, टूटती सांसें और रस्सियों से बंधे दरवाजे खोल रहे सरकारी दावों की पोल,हादसों के इंतजार में सो रहा शहडोल का प्रशासन


Junaid Khan - शहडोल। संभाग में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह से वेंटिलेटर पर आ चुकी है और जिम्मेदार अधिकारी गहरी नींद में सो रहे हैं। सड़कों पर दौड़ रही दर्जनों निजी बसें किसी चलते-फिरते 'लोहे के ताबूत' से कम नहीं हैं। विडंबना देखिए कि जिस बस की बॉडी पूरी तरह गल चुकी है, खिड़कियों के कांच गायब हैं,और जिनके दरवाजे लोहे की कुंडी के बजाय बोरियों की रस्सियों से बांधकर बंद किए जा रहे हैं, उन्हें आरटीओ (RTO) विभाग से धड़ल्ले से 'फिटनेस सर्टिफिकेट' जारी किया जा रहा है। प्रशासन की यह आपराधिक अनदेखी किसी बड़े और रूह कंपा देने वाले हादसे को खुला निमंत्रण दे रही है। जिला मुख्यालय से लेकर जयसिंहनगर, बुढ़ार, ब्यौहारी, जैतपुर, सोहागपुर और सुदूर ग्रामीण अंचलों के लंबे रूटों पर ऐसी कबाड़ बसें सीना ताने दौड़ रही हैं, जिन्हें देखकर साफ लगता है कि इन्हें कबाड़खाने से सीधे सड़क पर उतार दिया गया है। जब इस गंभीर लापरवाही पर आरटीओ से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो हमेशा की तरह उनका फोन रिसीव नहीं हुआ, जो विभाग की संदेहास्पद चुप्पी को साफ बयां करता है।

फाइलों में कैद सड़क सुरक्षा,रसूखदारों के दबाव में आरटीओ ने मूंदी आंखें

हर महीने बंद कमरों और एयरकंडीशंड दफ्तरों में 'सड़क सुरक्षा समिति' की बैठकें होती हैं। बड़े-बड़े दावों, कागजी निर्देशों और खोखली नसीहतों की भारी-भरकम फाइलें तैयार की जाती हैं। आम जनता को हेलमेट न पहनने पर कानून का पाठ पढ़ाने वाली पुलिस और आरटीओ की सख्ती इन कबाड़ बसों के सामने आते ही घुटने टेक देती है। सूत्रों की मानें तो राजनीतिक रसूख और ऊंचे संपर्कों वाले बस ऑपरेटरों के दबाव में परिवहन विभाग अपनी आंखें पूरी तरह मूंदे बैठा है। बसों के परमिट और फिटनेस की जांच के नाम पर केवल 'कागजी खानापूर्ति' और औपचारिकता निभाई जा रही है। इतिहास गवाह है कि जिला प्रशासन और परिवहन विभाग का अमला तभी जागता है जब कोई बड़ी गाड़ी खाई में गिर जाती है, दर्जनों घर तबाह हो जाते हैं या मासूमों की जान चली जाती है। तब आनन-फानन में जांच दल गठित होते हैं और दो-चार पुरानी बसों पर चालानी कार्रवाई कर अपना पल्ला झाड़ लिया जाता है। वर्तमान भयावह स्थिति को देखकर लगता है कि विभाग फिर किसी बड़ी अनहोनी और बिछने वाली लाशों का इंतजार कर रहा है।

जुगाड़' के सहारे सुरक्षा,रस्सियों से बंधे गेट, नीचे लेटकर हो रही मरम्मत 

परिवहन नियमों की धज्जियां उड़ाने का लाइव नजारा इन बसों के गेट पर साफ देखा जा सकता है। बस के प्रवेश द्वार पर बड़े अक्षरों में 'गेट प्यार से बंद करें' जैसी नसीहतें तो लिखी हैं, लेकिन असलियत यह है कि दरवाजा बंद करने के लिए कोई ताला या कुंडी है ही नहीं; बल्कि उसे बोरी सिलने वाली सुतली और मोटी रस्सियों के सहारे बांधा जा रहा है। अगर सफर के दौरान तेज रफ्तार में यह रस्सी खुल गई, तो यात्री का सीधे सड़क पर गिरना और मौत के मुंह में जाना तय है। हद तो तब हो जाती है जब फिटनेस का शत-प्रतिशत दावा करने वाली ये बसें बीच रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं। बस स्टैंड और सार्वजनिक परिसरों के बीचो-बीच गाड़ी को खड़ा कर, ड्राइवर और क्लीनर नीचे लेटकर उसकी मैकेनिकल मरम्मत करते नजर आते हैं। यह नजारा चिल्ला-चिल्ला कर बता रहा है कि इन बसों का इंजन और मैकेनिकल कंडीशन किस कदर कबाड़ हो चुकी है,लेकिन आरटीओ के उड़नदस्ते को यह दिखाई नहीं देता।

कुशन गायब,सिर्फ लोहे का ढांचा,यात्रियों की कमर तोड़ रहा सफर 

इन बसों के भीतर का मंजर किसी प्रताड़ना केंद्र जैसा है। सीटों की हालत पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। यात्रियों के बैठने के लिए जो कुशन होना चाहिए, वह पूरी तरह गायब है और उसकी जगह अब सिर्फ धारदार लोहे के एंगल और फटे हुए कवर बचे हैं। लंबी दूरी के सफर में ये सीटें यात्रियों को आराम देने के बजाय उनकी कमर तोड़ने और उन्हें घायल करने के लिए काफी हैं। ग्रामीण रूटों पर चलने वाली इन बसों में न तो कोई इमरजेंसी एग्जिट (आपातकालीन द्वार) काम कर रहा है और न ही अग्निशमन का कोई इंतजाम है। आपातकालीन द्वारों को स्थाई रूप से बंद कर दिया गया है या वहां सामान ठूंस दिया गया है। पैसे पूरे वसूलने के बावजूद यात्रियों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है और उन्हें मौत के साये में सफर करने पर मजबूर किया जा रहा है।

जेके न्यूज' की सीधी चुनौती,कब जागेगा सोया हुआ तंत्र? 

यह सिर्फ एक खबर नहीं,बल्कि आम जनता की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे उस गठजोड़ के खिलाफ 'जेके न्यूज' का सीधा शंखनाद है, जो चंद रुपयों के मुनाफे के लिए हर रोज हजारों जिंदगियों को दांव पर लगा रहा है। हम जिला प्रशासन, आरटीओ विभाग और परिवहन मंत्री से सीधे तौर पर यह सवाल पूछते हैं कि आखिर इन कबाड़ वाहनों को सड़कों पर दौड़ने की हरी झंडी किसने और क्यों दी? क्या आरटीओ विभाग के पास इन बसों को चेक करने का समय नहीं है या फिर 'महीने की मलाई' ने उनकी आंख-कान और अंतरात्मा को पूरी तरह बहरा कर दिया है? इस कबाड़ राज और अवैध परिवहन पर तुरंत पूर्ण प्रतिबंध लगना चाहिए। अगर समय रहते इन मौत की गाड़ियों को सड़कों से नहीं हटाया गया और आरटीओ ने अपनी जवाबदेही तय नहीं की, तो हमारा अखबार इस भ्रष्टाचार को बेनकाब करने के लिए उग्र आंदोलन और जन-अभियान चलाने से पीछे नहीं हटेगा।

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