टोल प्लाजा के 'तीसरे नेत्र' ने खोली वीआईपी अपराधियों की पोल,रीवा से शाहडोल तक खंगाले गए फुटेज,क्या सिर्फ एक 'हादसा' था या सोची-समझी साजिश? उठ रहे हैं बड़े सवाल?
Junaid Khan - शहडोल। ब्यौहारी भाजपा नेताओं की संदिग्ध मौत के बहुचर्चित मामले में आखिरकार उस 'सफेदपोश' मौत की गाड़ी का सुराग मिल ही गया, जिसने दो हंसते-खेलते परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया। ब्यौहारी क्षेत्र में भाजपा नेता राहुल द्विवेदी और अतुल तिवारी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के बाद से इलाके में जो आक्रोश की चिंगारी भड़की थी, वह अब प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। पुलिस भले ही इसे महज एक सड़क हादसा साबित करने की जुगत में लगी हो, लेकिन जनता के मन में सुलग रहे सवाल व्यवस्था की नीयत पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं। रीवा से लेकर शाहडोल तक के सभी टोल नाकों के सीसीटीवी फुटेज खंगालने के बाद पुलिस की 'तीसरी आंख' (CCTV) को जो कामयाबी मिली है, उसने सीधे तौर पर छत्तीसगढ़ के रसूखदारों के कनेक्शन को बेनकाब कर दिया है। छत्तीसगढ़ के धमतरी से बरामद हुई सफेद रंग की लग्जरी कार (महिंद्रा स्कार्पियो) का अगला हिस्सा पूरी तरह क्षतिग्रस्त होना खुद गवाही दे रहा है कि टक्कर कितनी भयानक थी।
ग्रामीणों का उग्र चक्काजाम और व्यवस्था को अल्टीमेटम, महकमे में मची खलबली
याद दिला दें कि बीते 10 मई की सुबह जब राहुल और अतुल के लहूलुहान शव ब्यौहारी क्षेत्र में मिले थे, तो पूरे संभाग में सनसनी फैल गई थी। स्थानीय ग्रामीणों ने इसे सामान्य दुर्घटना मानने से साफ इनकार करते हुए 'सोची-समझी हत्या' की आशंका जताई थी। आक्रोशित जनता ने सड़क पर उतरकर चक्काजाम कर दिया था, जिसके बाद पुलिसिया तंत्र को मजबूरन नींद से जागना पड़ा। मीडिया में लगातार उठी आवाजों और जनता के भारी दबाव के बाद ही पुलिस ने वैज्ञानिक साक्ष्यों का सहारा लिया। यदि उस वक्त जनता का यह रौद्र रूप सामने न आता, तो शायद इस रसूखदार गाड़ी और उसके मालिक तक खाकी के हाथ कभी नहीं पहुँच पाते। अब जब छत्तीसगढ़ के धमतरी में गाड़ी बरामद हो चुकी है और वाहन मालिक तुलाराम साहू के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, तब जाकर मामले में कानूनी लीपापोती की गुंजाइश थोड़ी कम हुई है।
प्रयागराज से छत्तीसगढ़ का 'सस्पेंस' ट्रैक,मालिक का कबूलनामा या बचने का बहाना?
थाना प्रभारी जिया उल हक के मुताबिक, पकड़े गए वाहन मालिक तुलाराम साहू ने पूछताछ में कबूला है कि वे अपने परिवार के साथ प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) से दर्शन कर छत्तीसगढ़ लौट रहे थे, तभी अचानक बाइक सामने आ जाने से यह दर्दनाक हादसा हो गया। लेकिन, एक मंझे हुए पत्रकार की नजर से देखें तो यह थ्योरी कई अनसुलझे सवाल छोड़ती है। क्या यह वाकई सिर्फ एक 'हिट एंड रन' का मामला है, या फिर इसके पीछे कोई गहरा आपराधिक षड्यंत्र छिपा है? जिस बेरहमी से दोनों युवकों को कुचला गया, क्या उसके पीछे कोई पुरानी रंजिश या इलाके में सक्रिय किसी अवैध सिंडिकेट का हाथ तो नहीं? वाहन मालिक का यह बयान कि 'अचानक बाइक सामने आ गई', महक एक कानूनी ढाल भी हो सकता है ताकि धारा 302 (हत्या) के बजाय मामले को धारा 304ए (लापरवाही से मौत) में तब्दील कर रसूखदारों को बचाया जा सके।
अवैध कारोबारियों और सोए हुए प्रशासन को सीधी चुनौती, कब तक मचेगा सड़कों पर तांडव?
यह खबर उन तमाम अवैध काम करने वालों और रातों-रात सड़कों पर तेज रफ्तार गाड़ियाँ दौड़ाने वाले माफियाओं के मुंह पर करारा तमाचा है, जो सोचते हैं कि वे पैसे और रसूख के दम पर बच निकलेंगे। यह सीधे तौर पर शाहडोल संभाग के पुलिस प्रशासन को भी चुनौती है कि वे इस मामले की विवेचना को केवल एक 'हादसे' की फाइल में बंद न करें। वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर वाहन की पहचान तो हो गई है, लेकिन पीड़ितों को असली न्याय तब मिलेगा जब इस घटना के पीछे की पूरी क्रोनोलॉजी और असली चेहरों को बेनकाब किया जाएगा। क्या पुलिस निष्पक्ष जांच कर पाएगी या फिर रसूख के आगे खाकी एक बार फिर नतमस्तक हो जाएगी? जेके न्यूज इस पूरे मामले की कमान संभाले हुए है और जब तक दोनों दिवंगत युवाओं को इंसाफ नहीं मिल जाता, तब तक प्रशासन से तीखे सवाल पूछने का यह सिलसिला थमेगा नहीं।
