रेलवे में तानाशाही की इंतेहा,बेबस रेलकर्मियों पर अधिकारियों की 'कागजी दादागीरी,मज़दूर कांग्रेस के चौतरफा घेराव के बाद झुका प्रशासन

तानाशाही रवैये पर उखड़े यूनियन नेता,2 घंटे की तीखी बहस के बाद छूटे 'साहब' के पसीने,जबरन थमाई गई चार्जशीट होंगी वापस 


Junaid Khan - शहडोल। भारतीय रेलवे में नौकरी का स्वरूप क्या अब सेवा से बदलकर किसी बंधुआ जेल जैसा हो चुका है? यह गंभीर सवाल आज रेल महकमे की कार्यशैली को देखकर खड़ा हो रहा है। जहां एक तरफ रेलकर्मियों से दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत ली जाती है, वहीं दूसरी तरफ उनके बीमार माता-पिता के इलाज, सगे भाई-बहन की शादी या खुद के ब्याह जैसी अत्यंत अनिवार्य घरेलू मजबूरियों के लिए घर जाने पर उन्हें 'पुरस्कार' के रूप में चार्जशीट और निलंबन थमा दिया जाता है। शहडोल और पेंड्रारोड मंडल में रनिंग स्टाफ के साथ लंबे समय से चल रहे इसी प्रशासनिक अत्याचार और दमनकारी नीतियों के खिलाफ आखिरकार रेलवे मज़दूर कांग्रेस ने आर-पार की जंग का बिगुल फूंक दिया है। इस तानाशाही के खिलाफ उठे जनआक्रोश और मीडिया की लगातार पैनी नजरों के असर के बाद अब प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।

अफसरों की 'कागजी दादागीरी' पर बरसे पदाधिकारी,याद दिलाया- 'रेलकर्मी इंसान हैं,रोबोट नहीं'

इस पूरे प्रशासनिक उत्पीड़न के विरोध में बिलासपुर के मंडल समन्वयक विजय अग्निहोत्री के कुशल निर्देशन और जोनल कार्यकारी अध्यक्ष लक्ष्मण राव के दमदार नेतृत्व में यूनियन का एक भारी-भरकम और आक्रामक प्रतिनिधिमंडल मैदान में उतरा। 14 मई को शहडोल में सहायक मंडल विद्युत अभियंता (AEEE OP) चंद्र प्रकाश मस्तुरिया के साथ हुई एक इन्फॉर्मल मगर बेहद तल्ख और मैराथन बैठक में मज़दूर कांग्रेस के नेताओं ने तीखे तेवर दिखाते हुए अधिकारियों की 'कागजी दादागीरी' की धज्जियां उड़ा दीं। बैठक में पेंड्रारोड के उन 12 बेकसूर कर्मचारियों की चार्जशीट का मुद्दा जोर-शोर से गूंजा,जिन्हें गंभीर घरेलू मजबूरियों के बावजूद मानसिक और प्रशासनिक रूप से प्रताड़ित किया गया था। साथ ही उन 6 अन्य रेलकर्मियों का पक्ष भी मजबूती से रखा गया, जिन्हें अधिकारियों ने अपने तानाशाही रवैये के चलते जबरन गैरहाजिर (एब्सेंट) दिखाकर उनका हक मारा था। नेताओं ने साफ लहजे में चेतावनी दी कि अफसरशाही अपनी ये मनमानी बंद करे,रेलकर्मी हाड़-मांस का इंसान है, कोई निर्जीव रोबोट नहीं।

2 घंटे की तीखी घेराबंदी से ढीले पड़े 'साहब' के तेवर, बैकफुट पर आया रेल प्रशासन

जब मज़दूर कांग्रेस के शाखा सचिव के लेटर पैड पर रनिंग स्टाफ की जायज समस्याओं, मानसिक शोषण और नियमों को ताक पर रखकर किए जा रहे प्रशासनिक अत्याचारों का पूरा पुलिंदा सीधे जिम्मेदार अधिकारी के सामने पटका गया, तो कार्यालय का माहौल पूरी तरह गरमा गया। लगभग दो घंटे तक चली इस हाई-वोल्टेज और तनावपूर्ण बहस के दौरान अधिकारियों के पास यूनियन के तीखे और तार्किक सवालों का कोई जवाब नहीं था। मीडिया की सक्रियता और यूनियन की एकजुटता के इस चौतरफा दबाव के आगे आखिरकार 'साहब' के कड़े तेवर ढीले पड़ गए। जो प्रशासन कल तक कर्मचारियों को कीड़े-मकौड़े समझकर अपनी कलम की धौंस दिखा रहा था, वह इस जोरदार घेराबंदी के बाद पूरी तरह बैकफुट पर आने को मजबूर हो गया।

आखिरकार घुटने टेकने पड़े,अधिकारियों ने दी सकारात्मक सफाई, सभी चार्जशीट होंगी माफ

प्रतिनिधिमंडल के इस बेहद आक्रामक और न्यायसंगत रुख के आगे आखिरकार सहायक मंडल विद्युत अभियंता (AEEE OP) शहडोल को घुटने टेकने ही पड़े। अपनी कुर्सी और साख को खतरे में देख अधिकारी ने तत्काल सुर बदले और पूरे मामले पर सकारात्मक सफाई पेश की। रेल प्रशासन की ओर से आधिकारिक आश्वासन दिया गया है कि जिन कर्मचारियों पर तानाशाही पूर्वक चार्जशीट थोपी गई थी, उन्हें तत्काल प्रभाव से माफ (निरस्त) किया जाएगा। इसके साथ ही, दुर्भावना और मनमाने ढंग से दर्ज की गई जबरन अनुपस्थिति (एब्सेंट) के मामलों पर भी पुनर्विचार कर उसे रिकॉर्ड से हटाया जाएगा। इस बड़ी जीत ने यह साबित कर दिया है कि यदि कर्मचारी और संगठन अपनी ताकत पर आ जाएं, तो कितनी भी बड़ी अफसरशाही क्यों न हो, उसे झुकना ही पड़ता है।

सोए हुए प्रशासन को जगाने में पेंड्रारोड और शहडोल टीम की एकजुटता रही ऐतिहासिक 

रेलवे प्रशासन की नींद उड़ाने और इस कामयाब घेराबंदी को अंजाम देने में पेंड्रारोड और शहडोल शाखा के पदाधिकारियों की एकजुटता की पूरे संभाग में चर्चा है। इस ऐतिहासिक संघर्ष में पेंड्रारोड शाखा सचिव हेमंत कुमार, उपाध्यक्ष दीपक सिंह, सहायक सचिव वीर सिंह मीणा, और ब्रांच काउंसलर किशन सिंह सहित शहडोल शाखा सचिव बालकृष्ण बंगारी, अध्यक्ष प्रभास कुमार और अनूपपुर शाखा सचिव जयंतोदास दासगुप्ता ने अपनी चट्टानी एकता का परिचय दिया। इन सभी जांबाज नेताओं ने मिलकर मूक और बहरे हो चुके रेल प्रशासन को यह कड़ा संदेश दिया है कि कर्मचारियों के अधिकारों पर डाका डालने वाले अधिकारियों को अब बख्शा नहीं जाएगा। बहरहाल, प्रशासन ने घुटने टेकते हुए वादे तो कर दिए हैं, लेकिन अब देखना यह है कि 'साहब' अपने इस लिखित और मौखिक आश्वासन पर कितनी जल्दी अमल करते हैं, या फिर कर्मचारियों को दोबारा सड़क पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

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