मजदूरों की 'बलि' पर कब तक खामोश रहेगा प्रबंधन? बंगवार खदान हादसे में बड़ी कार्रवाई,

मजदूरों की 'बलि' पर कब तक खामोश रहेगा प्रबंधन? बंगवार खदान हादसे में बड़ी कार्रवाई, 


Junaid Khan - शहडोल। धनपुरी कोयला अंचल के बंगवार माइंस में लगातार हो रही सुरक्षा चूक और प्रबंधन की तानाशाही पर आखिरकार कानून का डंडा चला है। मीडिया में इस गंभीर लापरवाही को लेकर लगातार चली खबरों के जमीनी असर के बाद, धनपुरी पुलिस ने एक बड़ा कदम उठाते हुए ठेका कंपनी के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ शिकंजा कस दिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, बंगवार कोयला खदान में कार्य के दौरान बिजली पोल से गिरकर असमय काल के गाल में समाए मासूम निजी मजदूर मोहराम सिंह (38 वर्ष), निवासी डोंगरा टोला (अनूपपुर) की मौत के मामले में पुलिस ने जांच के बाद ठेका कंपनी के फोरमैन इंजीनियर जयकुमार वर्मा और खान अभियंता विकास सिंह के खिलाफ लापरवाही और गैर-इरादतन कृत्य का अपराध पंजीबद्ध कर लिया है। बताया जाता है कि यह कार्रवाई केवल एक शुरुआत है, क्योंकि जिस तरह से इस पूरे मामले को दबाने की कोशिश की जा रही थी, उसे मीडिया की सजग पत्रकारिता ने बेनकाब कर दिया। अब इस कार्रवाई से पूरे धनपुरी और शहडोल के खदान क्षेत्रों में हड़कंप मचा हुआ है, वहीं दूसरी ओर उन सफेदपोश ठेकेदारों और अधिकारियों के पसीने छूट रहे हैं जो मजदूरों के खून-पसीने पर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं।

जांच में खुली पोल,न सीढ़ी थी,न सुरक्षा कवच; आखिर मौत के कुएं में क्यों धकेला गया? 

पुलिस की प्राथमिक जांच और घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने पर जो कड़वा सच सामने आया है, वह न केवल हैरान करने वाला है बल्कि रोंगटे खड़े कर देने वाला है। गत 8 अप्रैल 2026 को बंगवार कॉलरी के मैनेजर ऑफिस के ठीक सामने, जहां सबसे ज्यादा सुरक्षा और निगरानी होनी चाहिए, वहां बिजली पोल पर मरम्मत का काम कराया जा रहा था। सुरक्षा के नाम पर धेले भर का इंतजाम नहीं था। हैरान करने वाली बात यह है कि इतनी ऊंचाई पर काम कराने के बावजूद न तो मजदूर को कोई सेफ्टी बेल्ट दिया गया, न सुरक्षा कवच और न ही मानक स्तर की कोई सीढ़ी उपलब्ध कराई गई। इसी घोर लापरवाही का नतीजा रहा कि मोहराम सिंह पोल से सीधे अनियंत्रित होकर नीचे पत्थरों पर आ गिरा और लहूलुहान हो गया। उसे तड़पती हालत में पहले बुढार अस्पताल और फिर स्थिति बिगड़ने पर शहडोल के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां जिंदगी और मौत के बीच जूझते हुए उपचार के दौरान उसने दम तोड़ दिया। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक और प्रबंधकीय हत्या का मामला प्रतीत होता है, जहां चंद रुपयों को बचाने के लिए एक गरीब आदिवासी अंचल के मजदूर की जान को दांव पर लगा दिया गया।

अवैध तौर-तरीकों और ठेकेदारी प्रथा के गठजोड़ को खुली चुनौती, 

अब बड़े मगरमच्छों पर कब गिरेगी गाज? इस पूरे मामले ने क्षेत्र में चल रहे खदानों के भीतर ठेकेदारी प्रथा, अवैध रूप से सुरक्षा नियमों के उल्लंघन और लेबर एक्ट की धज्जियां उड़ाने वाले रसूखदारों को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह एफआईआर (FIR) केवल दो मोहरों इंजीनियर जयकुमार वर्मा और खान अभियंता विकास सिंह पर होकर ही नहीं रुकनी चाहिए। सवाल यह उठता है कि क्या खदान के मुख्य सुरक्षा अधिकारी, महाप्रबंधक और ठेका कंपनी के मुख्य मालिक इस जघन्य लापरवाही से अनभिज्ञ थे? बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के कोलियरी परिसर के भीतर खुलेआम मौत का खेल चलता रहा और प्रशासनिक अमला आंखें मूंदे बैठा रहा। क्षेत्र के प्रबुद्ध जनों और श्रमिक संगठनों का कहना है कि अगर इस मामले में केवल इन दो अधिकारियों को बलि का बकरा बनाकर मुख्य दोषियों को बचाया गया, तो यह न्याय के साथ भद्दा मजाक होगा। अब देखना यह है कि प्रशासन और पुलिस विभाग इस मामले में आगे कितनी निष्पक्षता दिखाता है, या फिर हमेशा की तरह इस रसूखदार गठजोड़ के सामने घुटने टेक देता है। इस खबर के बाद से पूरे कोयलांचल में आक्रोश व्याप्त है और लोग अब सीधे खदान प्रबंधन को चुनौती दे रहे हैं।

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