परिवहन विभाग की तानाशाही: आरटीओ में फाइलों का 'बंधक' खेल,वाहन सरेंडर के नाम पर वसूली का नया खेल उजागर

नियमों की धज्जियां उड़ाते जिम्मेदार; मिनसोल लिमिटेड ने कलेक्टर-कमिश्नर से की भ्रष्टाचार की शिकायत, दो गुने टैक्स की मार से उद्यमी बेहाल 


Junaid Khan - शहडोल। संभाग के परिवहन विभाग में इन दिनों कार्यप्रणाली कम और 'फाइलों का सौदा' ज्यादा सुर्खियों में है। सोहागपुर क्षेत्र के शारदा ओपनकास्ट प्रोजेक्ट में संचालित मिनसोल लिमिटेड द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार और जानबूझकर कार्य रोकने के आरोपों ने जिला प्रशासन की नींद उड़ा दी है। कंपनी के एडमिन ऑफिसर डॉ. पंकज शर्मा ने सीधे तौर पर क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (RTO) पर गंभीर आरोप लगाते हुए कलेक्टर और कमिश्नर को पत्र लिखा है। शिकायत में स्पष्ट किया गया है कि विभाग की लापरवाही और सुस्ती महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि वाहन मालिकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने की एक सोची-समझी साजिश है। शिकायत के तकनीकी पहलुओं पर गौर करें तो मामला बेहद संगीन है। कंपनी ने मार्च 2026 के प्रथम सप्ताह में ही अपने तीन टिपर्स को सरेंडर करने के लिए विधिवत आवेदन किया था। कंपनी का दावा है कि उन्होंने संपूर्ण टैक्स और आवश्यक दस्तावेज समय सीमा के भीतर जमा कर दिए थे। बावजूद इसके, आरटीओ कार्यालय ने फाइलों को 'कोल्ड स्टोरेज' में डाल दिया। आरोप है कि लगातार अवकाश और अन्य बहाने बनाकर फाइलों को जानबूझकर दबाए रखा गया। जब फाइलें लौटाई गईं, तब तक अप्रैल का महीना शुरू हो चुका था, जिससे वाहन मालिकों पर एक और त्रैमासिक टैक्स का अतिरिक्त बोझ लाद दिया गया। 

भ्रष्टाचार का डिजिटल खेल 

कंपनी का कहना है कि फाइलें मार्च में ही पूरी थीं, लेकिन प्रशासन ने जानबूझकर 06 अप्रैल को पोर्टल पर अपडेट किया ताकि नया टैक्स वसूला जा सके। क्या यह तकनीकी गड़बड़ी है या 'मलाई' खाने का नया तरीका? प्रशासनिक अधिकारियों के तर्क अब गले नहीं उतर रहे हैं। विभाग का कहना है कि फाइलें 06 अप्रैल को पोर्टल पर अपलोड हुई हैं, इसलिए नियमानुसार नया टैक्स देय होगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि मार्च के पहले हफ्ते से लेकर अप्रैल तक फाइलें किस अलमारी में धूल फांक रही थीं? क्या पोर्टल की देरी के लिए वाहन मालिक जिम्मेदार है? यह सीधा-सीधा भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है, जहाँ आम जनता और उद्योगपतियों को प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जाल में फंसाकर उनसे मोटी रकम ऐंठने की कोशिश की जा रही है। हैरानी की बात यह है कि जब इस गंभीर अनियमितता के संबंध में आरटीओ अनपा खान से पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने न तो फोन उठाया और न ही संदेशों का जवाब दिया। एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी की यह चुप्पी कई संदेहों को जन्म देती है। क्या विभाग के पास इस गड़बड़ी का कोई जवाब नहीं है या फिर उच्च स्तर पर बैठे लोगों का मौन समर्थन प्राप्त है? शहडोल संभाग में इस तरह की कार्यप्रणाली न केवल निवेश को प्रभावित करती है, बल्कि सरकार की पारदर्शी छवि पर भी कालिख पोतती है। अब गेंद कलेक्टर और कमिश्नर के पाले में है। मिनसोल लिमिटेड ने मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की है। यदि समय रहते इन 'फाइल दलालों' पर लगाम नहीं कसी गई, तो परिवहन विभाग केवल वसूली का केंद्र बनकर रह जाएगा। भ्रष्टाचार के इस मकड़जाल को तोड़ने के लिए अब कड़े प्रशासनिक प्रहार की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी फाइलों को बंधक बनाने की जुर्रत न कर सके।

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