मौत के सौदागर: क्या अब दवा की दुकानें 'कत्लगाह' बन चुकी हैं? एक्सपायरी दवा ने छीनी बुजुर्ग की जुबान और जहान

प्रशासन की नाक के नीचे चल रहा है जहर का कारोबार; सिंहपुर के श्रीवास्तव मेडिकल स्टोर की घोर लापरवाही ने एक हंसते-खेलते परिवार को मातम में बदला, जिम्मेदार अब भी मौन 


Junaid Khan - शहडोल। जिले में मानवता को शर्मसार और व्यापारिक नैतिकता को तार-तार करने वाला एक ऐसा खौफनाक सच सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। सिंहपुर स्थित एक मेडिकल स्टोर संचालक की चंद रुपयों की लालच और कथित आपराधिक लापरवाही ने एक वृद्ध महिला को जीते-जी 'जिंदा लाश' बना दिया। यह केवल एक चिकित्सा त्रुटि नहीं है, बल्कि सफेदपोश अपराधियों द्वारा किया गया वह कृत्य है जिसे 'धीमा कत्ल' कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा।

खुशियों के घर में पसरा सन्नाटा

जानकारी के मुताबिक, नवलपुर निवासी 65 वर्षीय रामकली पाल अपनी नातिन की शादी की खुशियां मना रही थीं। विदाई के बाद 'चौथी' के कार्यक्रम में शामिल होने वह डिंडौरी जा रही थीं, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। रास्ते में अचानक तबीयत बिगड़ने पर परिजनों ने सिंहपुर स्थित श्रीवास्तव मेडिकल स्टोर से 'ओडम' नामक दवा खरीदी। उन्हें क्या पता था कि जीवनदान के नाम पर उन्हें जो शीशी थमाई जा रही है, उसमें जहर घुला है।

दवा गले से उतरी और थम गई जिंदगी की रफ़्तार 

परिजनों का सीधा आरोप है कि मेडिकल स्टोर संचालक ने बिना किसी डॉक्टर की सलाह के एक्सपायरी (अवधि पार) या बेहद घटिया स्तर की दवा थमा दी। दवा लेते ही राहत मिलना तो दूर, रामकली की हालत चंद मिनटों में इतनी बिगड़ी कि वह मौके पर ही सुध-बुध खो बैठीं। आनन-फानन में उन्हें डिंडौरी और फिर शहडोल जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उन्हें गंभीर स्थिति में मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया गया।

डॉक्टरों के खुलासे से फटी रह गईं आंखें 

उपचार के दौरान डॉक्टरों ने जो खुलासा किया, उसने परिजनों के पैरों तले जमीन खिसका दी। चिकित्सकों के अनुसार, गलत या जहरीली दवा के घातक असर के कारण वृद्धा का पूरा शरीर लकवाग्रस्त (पैरालिसिस) हो चुका है। जिस महिला के कंधों पर परिवार की खुशियों का दारोमदार था, वह आज एक एक्सपायरी दवा के कारण बिस्तर पर आ गई है। सवाल यह उठता है कि क्या इन दुकानदारों के पास इंसानी जान की कोई कीमत नहीं है?

ड्रग इंस्पेक्टर और स्वास्थ्य विभाग: कागजों पर मुस्तैद, जमीन पर नदारद 

यह घटना जिले के ड्रग इंस्पेक्टर और स्वास्थ्य विभाग के उन दावों की पोल खोलती है, जिनमें वे समय-समय पर निरीक्षण और कार्रवाई की बात करते हैं। यदि विभाग सक्रिय होता, तो किसी झोलाछाप या गैर-जिम्मेदार दुकानदार की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह बिना पर्ची के प्रतिबंधित या एक्सपायरी दवाएं खुलेआम बेच सके। क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?

सफेदपोश अपराधियों को किसका संरक्षण? 

बिना डॉक्टर की पर्ची के दवा देना कानूनन अपराध है, लेकिन शहडोल और आसपास के ग्रामीण इलाकों में यह धंधा धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। श्रीवास्तव मेडिकल स्टोर जैसे संस्थान अब सेवा के केंद्र नहीं, बल्कि 'कत्लगाह' की शक्ल ले चुके हैं। इन सफेदपोश अपराधियों पर नकेल कब कसी जाएगी? क्या सिर्फ लाइसेंस रद्द कर देना काफी है, या इन पर गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए?

आक्रोश की आग और इंसाफ की गुहार

घटना के बाद से ही क्षेत्र के लोगों में भारी आक्रोश व्याप्त है। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है और वे अब न्याय के लिए सड़कों पर उतरने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते ऐसे संस्थानों पर कठोरतम कार्रवाई नहीं हुई, तो न जाने और कितनी 'रामकली' इन बेरहम व्यापारियों की भेंट चढ़ जाएंगी।

प्रशासन को सीधी चुनौती 

यह खबर उन तमाम अधिकारियों के लिए एक चुनौती है जो एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर 'सब चंगा' का दावा करते हैं। इस खबर के माध्यम से प्रशासन से मांग की जाती है कि जिले के हर मेडिकल स्टोर की सघन जांच हो। एक्सपायरी दवाओं के स्टॉक को नष्ट करने की प्रक्रिया पारदर्शी हो और आरोपी संचालक के खिलाफ ऐसी मिसाल पेश की जाए कि भविष्य में कोई भी व्यापारी किसी की जान से खिलवाड़ करने की जुर्रत न कर सके।

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