दबंगई की पराकाष्ठा,दिव्यांग का आशियाना उजाड़ कर नज़ूल की भूमि पर अवैध कब्जा,प्रशासन मौन

50 वर्षों से काबिज परिवार को घर से बेदखल कर रातों-रात शुरू किया निर्माण, धनपुरी पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल 


Junaid Khan - शहडोल। धनपुरी न्याय की आस में भटकते एक दिव्यांग की सिसकियां आज शासन और प्रशासन के उन दावों की पोल खोल रही हैं, जो भू-माफियाओं के विरुद्ध 'जीरो टॉलरेंस' की बात करते हैं। धनपुरी वार्ड क्रमांक 19 निवासी सुखराम विश्वकर्मा, जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं, आज अपने ही घर की जमीन से बेदखल कर दिए गए हैं। यह मामला केवल एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रशासन की कार्यक्षमता को दी गई चुनौती है, जहाँ एक तरफ सरकार सरकारी जमीनों को संरक्षित करने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर दबंगों द्वारा नज़ूल की भूमि पर दिन-दहाड़े कब्जा कर अवैध निर्माण कार्य बेधड़क जारी है। मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पीड़ित सुखराम का परिवार पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से उक्त स्थल पर निवासरत है। पिता स्व. अमर चंद्र विश्वकर्मा के समय से ही इस जगह का नगरपालिका टैक्स नियमित रूप से भरा जा रहा है और पिता की मृत्यु के बाद विधिवत नामान्तरण भी कराया गया। बावजूद इसके, 13 मई 2026 को चंद्रशेखर महतो नामक व्यक्ति ने अपने साथियों के साथ मिलकर दिव्यांग सुखराम को उनके ही घर से जबरन बाहर निकाल दिया। बेसहारा और शारीरिक रूप से अक्षम होने के कारण सुखराम इस अन्याय का विरोध करने की स्थिति में नहीं थे, जिसका फायदा उठाते हुए दबंगों ने उनके घर को जमींदोज कर दिया। हैरानी की बात यह है कि जिस नज़ूल की भूमि को शासन नियमानुसार विक्रय नहीं कर सकता, उस पर दबंगों ने फर्जी तरीके से मालिकाना हक जताकर निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया है। आखिर प्रशासन की नाक के नीचे सरकारी जमीन की खरीद-फरोख्त' का यह काला खेल कौन खेल रहा है? न्याय के लिए जब पीड़ित धनपुरी थाने पहुंचा, तो वहां का अनुभव और भी चौंकाने वाला रहा। पीड़ित का आरोप है कि पुलिस ने शिकायत दर्ज करने के बजाय उसे यह कहकर वापस भेज दिया कि 'वह जगह उन्हीं की है'। बिना किसी जांच या दस्तावेजी पुष्टीकरण के पुलिस का यह रवैया सीधे तौर पर दोषियों को संरक्षण देने जैसा प्रतीत होता है। जब कानून के रखवाले ही फरियादी को दुत्कार कर भगा दें, तो अपराधियों के हौसले बुलंद होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि आज उस विवादित स्थल पर निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर जारी है, जिसे रोकने की जहमत किसी जिम्मेदार अधिकारी ने नहीं उठाई है। यह घटना सीधे तौर पर जिला प्रशासन और पुलिस अधीक्षक को चुनौती दे रही है। क्या एक दिव्यांग नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है? नज़ूल की भूमि पर हो रहे इस अवैध निर्माण ने राजस्व विभाग की सतर्कता पर भी बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। फिलहाल, पीड़ित सुखराम विश्वकर्मा ने पुलिस अधीक्षक, कलेक्टर और आईजी कार्यालय की चौखट पर दस्तक दी है। अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन इस दबंगई पर लगाम कसते हुए एक दिव्यांग को उसका हक दिला पाता है या फिर फाइलें शिकायतों के ढेर में दबकर रह जाएंगी। यह खबर उन सभी सफेदपोश चेहरों के लिए भी एक चुनौती है जो इस अवैध काम की पटकथा के पीछे छिपे हुए है। संपादकीय नोट: अखबार में पूर्व में प्रकाशित खबरों का असर न होने और दबंगों के बढ़ते हौसलों के खिलाफ यह विशेष रिपोर्ट तैयार की गई है।

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