आरपीएफ की नाक के नीचे तेल माफिया का बड़ा डाका; बुढार स्टेशन के लाइन नंबर 5 पर हुई इस सनसनीखेज वारदात ने उड़ाए सुरक्षा के परखच्चे, अंदरूनी मिलीभगत की बू
Junaid Khan - शहडोल। बुढार एक तरफ जहां वैश्विक हलचलों के बीच देश में ईंधन की किल्लत और पेट्रोल पंपों पर हाहाकार जैसी स्थिति बनी हुई है, वहीं शहडोल जिले में बेखौफ चोरों ने सीधे भारतीय रेलवे को ही चूना लगाकर कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। मामला बुढार रेलवे स्टेशन के यार्ड का है, जहां अमूमन 'हाई-सिक्योरिटी जोन' माने जाने वाले परिसर के लाइन नंबर 5 पर एक मालगाड़ी का डीजल रेल इंजन खड़ा था। हर वक्त जवानों की आवाजाही और कड़े पहरे वाले इस संवदेनशील इलाके में शातिर चोरों ने एक-दो नहीं, बल्कि 1200 लीटर से अधिक कीमती डीजल उड़ा दिया और रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) को भनक तक नहीं लगी। चोरों ने बाकायदा बेधड़क होकर इंजन का भारी लॉक तोड़ा और बड़े आराम से सैकड़ों लीटर सरकारी ईंधन पार कर दिया। चोरों की यह 'सुपरफास्ट' चालाकी और दुस्साहस देखकर हर कोई दंग है। इस वारदात ने रेलवे की सुरक्षा प्रणाली की कलई खोलकर रख दी है और सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा कर दिया है कि जब आम जनता की सुरक्षा का दम भरने वाली आरपीएफ स्टेशन पर ही मौजूद थी, तब चोरों को इतनी बड़ी मात्रा में डीजल निकालने, उसे कंटेनरों में भरने और वहां से सुरक्षित ले जाने का लंबा समय कैसे मिल गया? क्या यह सिर्फ बाहरी चोरों की चालाकी है या फिर इसके पीछे महकमे के भीतर बैठे सफेदपोशों और अंदरूनी मिलीभगत का कोई बहुत बड़ा खेल चल रहा है? जिले में पहले भी ट्रकों और निजी वाहनों से तेल चोरी होना आम बात थी, लेकिन अब देश की लाइफलाइन कही जाने वाली सीधे रेल इंजन में सरेआम डाका डालना आरपीएफ की कार्यप्रणाली पर एक गहरा और कभी न मिटने वाला दाग है। रेलवे की नाक के नीचे सक्रिय यह संगठित तेल माफिया अब सीधे सरकार और प्रशासन की साख को खुली चुनौती दे रहा है। जब इस बेहद संवेदनशील और गंभीर मामले पर अनूपपुर आरपीएफ इंस्पेक्टर एम. पात्रा से बात की गई, तो उन्होंने कैमरे के सामने आकर कुछ भी खुलकर बोलने से साफ इनकार कर दिया, जो विभाग की संदेहास्पद चुप्पी को और हवा देता है। हालांकि, दबी जुबान में उन्होंने भारी दबाव के बीच चोरी की बात स्वीकारते हुए केवल इतना कहा कि "मामला दर्ज कर चोरों की तलाश की जा रही है।" लेकिन 20 साल के तजुर्बे वाले मीडिया जगत और जागरूक जनता के गले यह रटा-रटाया प्रशासनिक जवाब नहीं उतर रहा है। सवाल यह है कि आखिर इस सिंडिकेट का असली आका कौन है और किसके संरक्षण में यह पूरा अवैध कारोबार फल-फूल रहा है?
