महाघोटाला,₹2.08 करोड़ की 'सरकारी डकैती' पर 06 साल बाद जागा प्रशासन, बर्खास्तगी तो हुई पर वसूली और जेल कब?

भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा,छात्रों के हक की छात्रवृत्ति डकार गए 'साहब', बैंक खातों के खेल से लेकर 07 संगीन आरोपों में घिरे तत्कालीन बीईओ बुढ़ार पर गिरी गाज


Junaid Khan - शहडोल। आदिवासी अंचल के नौनिहालों के भविष्य और सरकारी खजाने पर डाका डालने वाले भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आखिरकार कागजी कार्रवाई का डंडा चल ही गया। शहडोल संभाग के बुढ़ार विकासखंड में वर्ष 2014 से 2020 के बीच हुए ₹2.08 करोड़ के भारी वित्तीय घपले में घिरे तत्कालीन प्रभारी विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) और वर्तमान व्याख्याता अशोक कुमार शर्मा को शासकीय सेवा से पदच्युत (बर्खास्त) कर दिया गया है। मध्य प्रदेश शासन के जनजातीय कार्य विभाग द्वारा जारी यह आदेश भले ही एक बड़ी कार्रवाई दिखे, लेकिन यह व्यवस्था पर भी बड़ा सवालिया निशान है कि 06 साल तक इस महाघोटाले की फाइलें प्रशासनिक टेबलों पर धूल क्यों फांकती रहीं? क्या सिर्फ नौकरी से निकालना ही ऐसे गंभीर आर्थिक अपराधियों के लिए काफी है, या फिर इस जनता की गाढ़ी कमाई की पाई-पाई की वसूली और इन 'सफेदपोश लुटेरों' को जेल की सलाखों के पीछे भेजना भी जरूरी है?

सरकारी खजाने में सेंधमारी,छात्रवृत्ति की राशि अन्य मदों में उड़ाई, बैंक खातों में किया काला खेल

जांच रिपोर्ट में जो खुलासे हुए हैं, वे विभागीय मिलीभगत और बिना किसी खौफ के किए गए भ्रष्टाचार की गवाही देते हैं। बर्खास्त अधिकारी अशोक कुमार शर्मा के खिलाफ विभागीय जांच में एक-दो नहीं, बल्कि पूरे सात संगीन आरोप पूरी तरह सिद्ध पाए गए हैं। इनमें शासकीय राशि का घोर दुरुपयोग, बैंक खातों के संचालन में भारी अनियमितता, और सबसे शर्मनाक—गरीब आदिवासी बच्चों की छात्रवृत्ति राशि का दूसरे मदों में अवैध रूप से उपयोग करना शामिल है। इतना ही नहीं, सरकारी पैसे पर कुंडली मारकर बैठे इस तंत्र ने बैंक खातों से मिलने वाली ब्याज राशि को भी जानबूझकर सरकारी कोष में जमा नहीं कराया। इसे महज 'अनियमितता' कहना इस बड़े अपराध को छोटा करने जैसा है, यह सीधे तौर पर सोची-समझी साजिश के तहत की गई वित्तीय डकैती है।

मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की मुहर, लेकिन प्रशासन के सामने अब भी कई बड़ी चुनौतियां 

विभागीय सूत्रों के अनुसार, आरोपी अधिकारी को अपना पक्ष रखने के लिए प्रशासन द्वारा कई बार 'अभयदान' यानी अवसर दिए गए, लेकिन आरोपों की फेहरिस्त इतनी पुख्ता थी कि मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की अंतिम सहमति के बाद मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम के तहत इन्हें सेवा से बर्खास्त करने का फरमान जारी करना ही पड़ा। लेकिन इस कार्रवाई के बाद अब स्थानीय प्रशासन और सरकार के सामने असली चुनौती खड़ी है। क्षेत्र की जनता और प्रबुद्ध वर्ग अब यह सवाल पूछ रहा है कि इस ₹2.08 करोड़ की राशि की रिकवरी (वसूली) किससे और कब की जाएगी? इस सिंडिकेट में शामिल अन्य छोटे-बड़े चेहरों को कब बेनकाब किया जाएगा? जब तक इन भ्रष्टाचारियों की संपत्ति कुर्क कर इन्हें जेल नहीं भेजा जाता, तब तक व्यवस्था को चुनौती देने वाले ऐसे तत्वों के हौसले बुलंद ही रहेंगे।

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