आसमान से बरसती आग के बीच 'यातना गृह' बना अस्पताल,कतारों में तड़प रहे दिव्यांग और गर्भवती महिलाएं, एसी-कूलर फाइलों में और जनता एक पंखे के भरोसे
Junaid Khan - शहडोल। भीषण गर्मी और आसमान से बरसती चिलचिलाती धूप के बीच जहां आम इंसान का जीना मुहाल हो चुका है, वहीं जिला अस्पताल का प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह संवेदनहीनता के मरुस्थल में तब्दील हो गया है। सुदूर अंचलों और ग्रामीण क्षेत्रों से मिलों का सफर तय कर इलाज की आस में आने वाले बीमार और बेबस लोग यहाँ राहत की एक-एक बूंद और हवा के एक झोंके के लिए तरस रहे हैं। चित्र फोटो में साफ देखा जा सकता है कि अस्पताल परिसर का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा आज किसी यातना गृह से कम नजर नहीं आ रहा है, जहाँ सैकड़ों की भारी भीड़ के बीच पूरे परिसर को ठंडी हवा देने के बजाय महज़ एक सरकारी खटारा पंखा चल रहा है। यह नाकाफी व्यवस्था अस्पताल प्रबंधन के उस दावों की पोल खोलती है जहाँ कागजों पर हर साल लाखों रुपए कूलर, एसी और मेंटेनेंस के नाम पर फूंक दिए जाते हैं। वीआईपी चैंबरों में बैठकर मलाई काट रहे जिम्मेदार अधिकारियों की नाक के नीचे आम जनता उमस और सफोकेशन के चलते काउंटर पर ही दम तोड़ने की कगार पर है। अस्पताल प्रबंधन की सबसे घिनौनी और लापरवाह तस्वीर एक्स-रे कक्ष के पास देखने को मिलती है, जिसे जानबूझकर एक 'डेथ-ट्रैप' में बदल दिया गया है। एक ही बेहद संकरे और दमघोंटू परिसर में सोनोग्राफी रूम, ड्रेसिंग रूम, विकलांग प्रमाण पत्र के आवेदन जमा करने का काउंटर और मन कक्ष (परामर्श केंद्र) एक साथ संचालित किए जा रहे हैं। सुबह होते ही यहाँ पैर रखने तक की जगह नहीं बचती। इसके बावजूद संवेदनहीनता का आलम यह है कि अस्पताल प्रशासन ने यहाँ मरीजों के बैठने के लिए न तो पर्याप्त कुर्सियों की व्यवस्था की है और न ही धूप-उमस से बचने का कोई पुख्ता इंतजाम। इस बदइंतजामी की सबसे क्रूर और सीधी मार उन गर्भवती महिलाओं और शारीरिक रूप से अक्षम दिव्यांगों पर पड़ रही है, जो घंटों कतारों में खड़े रहने को मजबूर हैं। सोनोग्राफी कराने आई गर्भवती महिलाओं की सेहत पर इस तपती उमस के कारण सीधा और जानलेवा असर पड़ रहा है, जबकि चलने-फिरने से लाचार विकलांग लोग भीषण गर्मी के बीच रेंगते हुए कतारों में तड़पने को विवश हैं। यह महज़ एक संयोग या तात्कालिक अव्यवस्था नहीं, बल्कि सीधे तौर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार और शासकीय बजट की खुली डकैती का जीवंत प्रमाण है। जनता यह पूछने का पूरा हक रखती है कि जब सरकार द्वारा जिला चिकित्सालयों को आदर्श और सर्वसुविधायुक्त बनाने के लिए हर वित्तीय वर्ष में करोड़ों रुपयों का भारी-भरकम बजट आवंटित किया जाता है, तो वह पैसा आखिर किसकी तिजोरी की शोभा बढ़ा रहा है? सूत्रों की मानें तो इस भारी अव्यवस्था और कतारों के पीछे एक सोची-समझी साजिश भी हो सकती है, ताकि परेशान मरीज दलालों के चंगुल में फंस सकें और प्रमाण पत्रों व जांच के नाम पर परदे के पीछे अवैध सेटिंग का खेल चल सके। हमारा समाचार पत्र इस पूरी बदइंतजामी के खिलाफ प्रशासन को खुली चुनौती देता है कि वे वातानुकूलित फाइलों से बाहर निकलें और इस तपते हुए नरक में मात्र एक घंटा बिना एसी के गुजार कर दिखाएं। यदि समय रहते इस संकरे कॉरिडोर की व्यवस्थाओं को दुरुस्त नहीं किया गया, तो यह तीखी कलम शांत नहीं बैठेगी और इस घोटालों की जड़ तक जाकर भ्रष्ट चेहरों को पूरी तरह बेनकाब करेगी।
प्रशासन से तीखे सवाल
कूलर-एसी के नाम पर प्रतिवर्ष आने वाला सरकारी मेंटेनेंस बजट आखिर कहाँ गायब हो जाता है?
एक ही संकरे गलियारे में 4 अति-संवेदनशील विभाग खोलने के पीछे क्या मंशा है? क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है?
गर्भवती महिलाओं और लाचार दिव्यांगों को घंटों फर्श पर बैठाकर प्रताड़ित करने वाले जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी?
