हाईकोर्ट के आदेश को भी ठेंगा, शहडोल में बेलगाम पटवारी की हठधर्मिता के आगे प्रशासनिक इकबाल तार-तार मूकदर्शक बना राजस्व अमला

मनचाही पोस्टिंग 'बराछ हल्के' के लिए अड़ा निलंबित होकर बहाल हुआ पटवारी; न्यायालय के निर्देशों को हवा में उड़ाकर दफ्तर से गायब, जयसिंहनगर तहसील में शह और मात का खेल जारी


Junaid Khan - शहडोल। प्रशासनिक अनुशासन को ठेंगा दिखाने और न्यायिक आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाने का एक सनसनीखेज मामला शहडोल जिले के जयसिंहनगर अनुभाग से सामने आया है, जहां एक पटवारी की हठधर्मिता और जिद के आगे पूरा राजस्व अमला बौना साबित हो रहा है। मामला जयसिंहनगर में पदस्थ पटवारी रमेश पटेल का है, जिन्होंने प्रशासनिक ट्रांसफर-पोस्टिंग के आदेश को मानने से न सिर्फ इनकार कर दिया, बल्कि देश की सर्वोच्च न्यायिक व्यवस्था यानी उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) के स्पष्ट निर्देशों को भी मखौल बनाकर रख दिया है। अपनी मनचाही और मलाईदार पोस्टिंग 'बराछ हल्के' को पाने की सनक में लीन इस शासकीय सेवक ने अब प्रशासनिक मर्यादाओं की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। विडंबना देखिए कि निलंबन और बहाली के इस हाई-प्रोफाइल ड्रामे के बीच यह विवाद अब जयसिंहनगर तहसील के भीतर शह और मात के बड़े खेल में तब्दील हो चुका है, जिसने समूचे राजस्व विभाग की साख और प्रशासनिक इकबाल पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।

प्रताड़ना का झूठा स्वांग रचकर न्यायालय को गुमराह करने की नाकाम कोशिश

सूत्रों और प्रशासनिक दस्तावेजों के अनुसार, इस पूरे विवाद की पटकथा 01 सितंबर 2025 को तब शुरू हुई, जब प्रशासनिक आवश्यकताओं के मद्देनजर पटवारी रमेश पटेल को 'बनसुकली' और 'मुदरियाटोला' हल्के की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लेकिन इस जनहितैषी आदेश को स्वीकार करने के बजाय पटवारी ने विभागीय अधिकारियों पर ही प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न के गंभीर लेकिन खोखले आरोप मढ़ दिए। तहसीलदार सुषमा धुर्वे ने त्वरित कार्रवाई करते हुए बाकायदा एक आधिकारिक प्रेस नोट जारी कर इन आरोपों को पूरी तरह निराधार, मनगढ़ंत और तथ्यहीन करार देकर मामले की पूरी वस्तुस्थिति को बेनकाब कर दिया है। खुद को पीड़ित दिखाने का स्वांग रच रहे पटवारी ने इस आदेश के खिलाफ माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर में एक रिट याचिका दायर की थी। जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 26 सितंबर 2025 को पटवारी को सख्त निर्देश दिए थे कि वह तत्काल आवंटित नए हल्कों में अपनी आमद दर्ज कराएं और अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत करें। मगर सत्ता और रसूख की हनक में डूबे पटवारी ने न्यायालय के इस आदेश को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया, जिसके बाद कर्तव्य में घोर लापरवाही और न्यायालय अवमानना के आरोप में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) जयसिंहनगर ने उन्हें तत्काल प्रभाव से सस्पेंड (निलंबित) कर दिया था।

बहाली के बाद फिर गायब: 'बराछ' की मलाई के लिए जनता के हक पर डकैती

निलंबन के खिलाफ भी पटवारी रमेश पटेल ने हाईकोर्ट में दूसरी याचिका लगाकर राहत पाने की कोशिश की, जिसे माननीय न्यायालय ने 19 जनवरी 2026 को सिरे से खारिज कर दिया, जिससे यह साफ हो गया कि प्रशासन की विभागीय कार्रवाई पूरी तरह नियमानुकूल थी। इसके बाद, 19 फरवरी 2026 को दिए गए एक अभ्यावेदन के आधार पर उदारता दिखाते हुए एसडीएम राजस्व जयसिंहनगर ने 02 मार्च 2026 को उनकी बहाली का आदेश जारी कर उन्हें 'पटवारी हल्का झगड़ा' में नई पदस्थापना दी। लेकिन पटवारी की नीयत में तो कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने 12 मार्च 2026 को कार्यालय में केवल कागजी उपस्थिति तो दर्ज कराई, लेकिन आज तक न तो 'झगड़ा हल्के' का प्रभार लिया और न ही दोबारा कार्यालय का रुख किया। पटवारी द्वारा लगातार 02 सितंबर 2025 और 26 मार्च 2026 को दिए गए आवेदनों से यह साफ जाहिर होता है कि उन्हें शासकीय सेवा या जनता की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है; उनकी सुई तो सिर्फ और सिर्फ 'बराछ हल्के' की मांग पर अटकी हुई है। सवाल यह उठता है कि क्या ट्रांसफर-पोस्टिंग अब शासकीय नियमों के बजाय किसी पटवारी की व्यक्तिगत पसंद और सनक से तय होगी? आखिर बराछ हल्के में ऐसा कौन सा 'गुप्त खजाना' या मलाई है, जिसके लिए यह पटवारी न्यायपालिका से लेकर प्रशासनिक तंत्र तक को चुनौती देने पर आमादा है? इस हठधर्मिता के कारण संबंधित हल्कों की आम जनता अपने राजस्व कार्यों के लिए भटकने को मजबूर है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी कड़ी कार्रवाई करने के बजाय इस तमाशे को मूकदर्शक बनकर देख रहे हैं।

आखिर कब तक चलेगा मनमर्जी का यह खेल?

नियम कहते हैं कि शासकीय सेवकों का ट्रांसफर और हल्का आवंटन प्रशासनिक आवश्यकताओं के आधार पर होता है, न कि किसी की व्यक्तिगत इच्छा पर। जब देश की उच्च न्यायालय ने पटवारी की याचिकाओं को खारिज कर नियमों को सही ठहराया है, तो फिर बहाली के बाद भी ड्यूटी से गायब रहने वाले इस कर्मचारी पर 'भगोड़ा' घोषित कर बर्खास्तगी की कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? क्या जयसिंहनगर का राजस्व प्रशासन किसी अदने से कर्मचारी के दबाव में है, या फिर इस मूक सहमति के पीछे कोई बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है? जवाब तो देना ही होगा।

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