मिलावटखोरों के सिंडिकेट को खुली चुनौती
Junaid Khan - शहडोल। नगर के ऐतिहासिक और व्यस्ततम गंज क्षेत्र से खरीदे गए चावल को लेकर इन दिनों पूरे संभाग में जबरदस्त हड़कंप और भय का माहौल है। इंटरनेट मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहे एक वीडियो ने खाद्य सुरक्षा दावों की कलई खोलकर रख दी है, जिसमें एक नागरिक द्वारा चावल को आग पर गर्म करने के दौरान उसके पिघलकर हूबहू प्लास्टिक जैसा रूप अख्तियार करने का सीधा दावा किया जा रहा है। वीडियो के सामने आते ही आम उपभोक्ताओं, राशन कार्ड धारकों और बाजार से खाद्यान्न खरीदने वाले मध्यमवर्गीय परिवारों में तीखा आक्रोश और गहरी आशंका व्याप्त हो गई है। हैरान करने वाली बात यह है कि जनता के निवाले में धीमा जहर घोले जाने के इस गंभीर इनपुट पर तत्काल छापामार कार्रवाई करने और संदिग्ध भंडारों को सील करने के बजाय, पूरा प्रशासनिक अमला केवल इंटरनेट पर आए वीडियो की प्रामाणिकता और उसमें सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ इस्तेमाल की गई भाषा (अपमानजनक शब्दों) को ढाल बनाकर अपनी चमड़ी बचाने में जुटा हुआ है। विशेषज्ञों का तकनीकी तर्क है कि चावल में प्राकृतिक रूप से मौजूद स्टार्च भी गर्म होने पर पिघलकर प्लास्टिक जैसा रूप और चिपचिपापन अख्तियार कर सकता है, जिसकी वास्तविक पुष्टि केवल और केवल उच्च स्तरीय लैब टेस्ट (FSSAI मानकों) के जरिए ही संभव है। परंतु बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन केवल वीडियो की जांच के नाम पर समय काटने और भ्रामक जानकारी फैलाने का ठीकरा जनता के सिर मढ़कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ सकता है? जब गंज क्षेत्र जैसे प्रमुख व्यापारिक केंद्रों से बिकने वाले अनाज की गुणवत्ता पर सरेआम सवालिया निशान लग रहे हों, तो खाद्य विभाग स्वतः संज्ञान लेकर कानूनी प्रावधानों के तहत त्वरित नमूने (Samples) क्यों नहीं उठा रहा? क्या विभाग किसी बड़ी जनहानि या महामारी का इंतजार कर रहा है, या फिर इस पूरे खेल के पीछे मिलावटखोरों और भ्रष्ट अधिकारियों का कोई गहरा भूमिगत गठजोड़ काम कर रहा है जो जनता की थाली में नकली अनाज परोसकर अपनी तिजोरियां भर रहा है? खाद्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने वीडियो का संज्ञान लिया है और बिना जांच के सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने वालों तथा सार्वजनिक सेवकों के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करने वालों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। विभाग की यह चेतावनी अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन यह जनता के उस बुनियादी अधिकार की अनदेखी नहीं कर सकती जो उन्हें शुद्ध भोजन की गारंटी देता है। प्रशासन को यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि सोशल मीडिया पर फूटने वाला जनता का यह गुस्सा, दरअसल तंत्र की वर्षों की निष्क्रियता और शिकायतों पर होने वाली लीपापोती का सीधा परिणाम है। यदि गंज क्षेत्र और आसपास के गोदामों में रखे चावल की शुद्धता पर रत्ती भर भी संदेह है, तो प्रशासन को केवल कागजी अपील जारी करने के बजाय पारदर्शी तरीके से औचक निरीक्षण कर मिलावटखोरों के इस पूरे रैकेट को ध्वस्त करना होगा, अन्यथा जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने की यह प्रशासनिक ढिलाई आने वाले दिनों में एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकती है।
