शाही दावों के बीच सुलगता आक्रोश,10 बजे की क्लास में 11 बजे पहुंच रहे छात्र,बेटियां असुरक्षित, कुंभकर्णी नींद में विश्वविद्यालय प्रबंधन
Junaid Khan - शहडोल। संभागीय मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर स्थित पंडित शंभूनाथ शुक्ल विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा का सपना लेकर आने वाले विद्यार्थियों के लिए हर दिन का सफर किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं रह गया है। ज्ञानार्जन की इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा खुद विश्वविद्यालय प्रशासन का लचर और असंवेदनशील परिवहन तंत्र बन चुका है। प्रबंधन की घोर लापरवाही का आलम यह है कि सैकड़ों छात्र-छात्राओं की भारी तादाद के सामने प्रशासन की ओर से चलाई जा रही महज पांच बसें पूरी तरह बौनी और नाकाफी साबित हो रही हैं। नियम कायदों के मुताबिक विश्वविद्यालय में कक्षाएं सुबह 10 बजे से प्रारंभ हो जाती हैं, लेकिन परिवहन की इस भारी किल्लत के चलते अधिकांश छात्र-छात्राएं सुबह 11 बजे के बाद ही कैंपस में कदम रख पाते हैं। साफ है कि जब नीव ही लेट-लतीफी और अव्यवस्था पर टिकी हो, तो जिम्मेदार किस मुंह से बेहतर शैक्षणिक माहौल का दंभ भर रहे हैं? दिन में पांच-पांच चक्कर लगाने के बावजूद ये बसें बढ़ती छात्र संख्या के आगे ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही हैं।
हर चौराहे पर जंग,ग्रामीण अंचलों के छात्रों का फूटा दर्द
सड़क से लेकर कैंपस तक का सफर संघर्ष की नई कहानी बयां कर रहा है। बस स्टैंड, गांधी चौराहा, बुढ़ार चौराहा, बागबास, जय स्तंभ चौक और धुरवार मोड़ जैसे प्रमुख पड़ावों पर सुबह से ही छात्र-छात्राओं का हुजूम लाचार खड़ा दिखाई देता है। इन चौराहों से गुजरने वाली बसें आते ही इस कदर खचाखच भर जाती हैं कि छात्रों को पैर रखने तक की जगह नहीं मिलती। मजबूरन ग्रामीण और दूरदराज के अंचलों से आने वाले विद्यार्थियों को घंटों धूल और धूप में खड़े रहकर अगली बस का इंतजार करना पड़ता है, जिससे उनकी पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हो रही है। इस जानलेवा भीड़ में सबसे ज्यादा परेशानी और असुरक्षा का सामना छात्राओं को करना पड़ रहा है। पलक मिश्रा, रानी विश्वकर्मा और शिवानी नापित जैसी छात्राओं का दर्द साफ बयां करता है कि 'हर दिन बस के पीछे भागना और उसमें लटक कर जाना अब उनकी मजबूरी बन चुकी है।' लड़कियों की सुरक्षा को ताक पर रखकर चलाया जा रहा यह परिवहन सिस्टम किसी बड़े हादसे को आमंत्रण दे रहा है, लेकिन प्रशासन किसी अनहोनी के बाद ही जागने की कसम खाए बैठा है।
छात्र संगठनों ने दी आंदोलन की चेतावनी, कुलपति के 'घिसे-पिटे' आश्वासन से बढ़ा असंतोष
इस प्रशासनिक नाकामी के खिलाफ अब छात्र संगठनों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। विद्यार्थियों ने व्यवहारिक सुझाव देते हुए मांग की है कि बसों की संख्या को तत्काल कम से कम दोगुना किया जाए। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले छात्रों को राहत देने के लिए सुबह 10 से 12 बजे के बीच धुरवार मोड़ से कम से कम एक अतिरिक्त विशेष बस का संचालन अनिवार्य रूप से किया जाए। छात्रों का साफ़ कहना है कि रास्ते में खड़ी बसों में यदि एक-दो छात्रों को समायोजित कर सुबह की पहली बस को सीधे धुरवार मोड़ तक भेजा जाए, तो मुख्य मार्ग का दबाव काफी हद तक कम हो सकता है। दूसरी ओर, इस सुलगते आक्रोश और शैक्षणिक अवरोध की आशंका के बीच विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामशंकर का वही पुराना और घिसा-पिटा बयान सामने आया है कि 'सुविधाओं को ठीक किया जा रहा है और थोड़ी-बहुत दिक्कत को जल्द दूर कर लिया जाएगा।' यह कछुआ चाल वाला ढांचागत सुधार बताता है कि जिम्मेदार अधिकारी एयरकंडीशनर कमरों में बैठकर छात्रों के इस जमीनी संघर्ष से कितने बेखबर हैं। यदि समय रहते बसों का बेड़ा नहीं बढ़ाया गया, तो यह शांत आक्रोश उग्र आंदोलन के रूप में विश्वविद्यालय प्रशासन का घेराव करने के लिए तैयार है।
