पंजीयन कार्यालय में महाघोटाले की गूंज,वकीलों के समर्थन के बाद हड़कंप कमिश्नर से शिकायत के बाद 'मैनेज' करने का खेल शुरू?

रजिस्ट्रार की सफाई के बावजूद उठे तीखे सवाल


Junaid Khan - शहडोल। संभागीय मुख्यालय स्थित उप पंजीयन (रजिस्ट्री) कार्यालय में तानाशाही, कथित भ्रष्टाचार और अवैध वसूली का मामला अब थमने का नाम नहीं ले रहा है। सर्विस प्रोवाइडरों द्वारा कमिश्नर सुरभि गुप्ता के समक्ष उठाई गई आवाज और 'दैनिक प्रदेश सत्ता' द्वारा इस गंभीर मुद्दे के बेबाक पर्दाफाश के बाद अब कानून के जानकारों का भी तीखा आक्रोश सामने आया है। जिला अधिवक्ता संघ के पूर्व अध्यक्ष संदीप तिवारी ने खुलकर इस महाघोटाले पर मोर्चा खोलते हुए नवागत कलेक्टर और उच्चाधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष, समयबद्ध व उच्चस्तरीय जाँच की पुरजोर मांग की है। वहीं दूसरी ओर, प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि कमिश्नर के यहाँ शिकायत पहुँचते ही कार्यालय में मामलों को दबाने और 'सब कुछ मैनेज' करने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं, जिससे शासन की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। पूर्व अध्यक्ष संदीप तिवारी ने साफ तौर पर कहा है कि पंजीयन कार्यालय ऐसा संस्थान है जहाँ आम नागरिक अपनी जीवनभर की गाढ़ी कमाई से जुड़ी संपत्तियों की रजिस्ट्री कराने आता है। यदि वहाँ नियमों को ताक पर रखकर मनमानी, डर का माहौल, अतिरिक्त स्टाम्प शुल्क की वसूली और दस्तावेजों को अनावश्यक रूप से लंबित रखने का खेल खेला जाएगा, तो सुशासन के दावों की धज्जियां उड़ना तय है। सर्विस प्रोवाइडरों का सीधा आरोप है कि आवासीय भूखंडों को जबरन व्यावसायिक श्रेणी में दर्शाकर स्टाम्प ड्यूटी में 'कमीशन का खेल' खेला जा रहा है और जियो टैगिंग जैसी तकनीकी व्यवस्थाओं का दुरुपयोग कर जनता का आर्थिक व मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा है। वकीलों और सर्विस प्रोवाइडरों के इस संयुक्त कड़े रुख ने प्रशासनिक अमले की नींद उड़ा दी है। दूसरी ओर, चौतरफा घिरे सब-रजिस्ट्रार सचिन जैन ने अपने बचाव में तमाम आरोपों को मनगढ़ंत और बेबुनियाद करार दिया है। उनका दावा है कि कार्यालय में एक भी दस्तावेज पेंडिंग नहीं है और सोमवार को भी 26 स्लॉट बुक कर सुचारू रूप से रजिस्ट्री की प्रक्रिया चल रही है सब-रजिस्ट्रार का कहना है कि वे स्टाम्प ड्यूटी की चोरी रोकने और शासकीय राजस्व की रिकवरी के लिए सख्त रवैया अपना रहे हैं—जिसके तहत साढ़े 9 लाख से लेकर सवा 10 लाख रुपये तक के रिकवरी आदेश जारी किए गए हैं। इसी सख्ती के कारण कुछ लोग बौखलाहट में झूठी शिकायतें कर रहे हैं। हालाँकि, प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि यदि अधिकारी दूध के धुले हैं तो जाँच से गुरेज क्यों? जब दर्जनों सर्विस प्रोवाइडर और वरिष्ठ अधिवक्ता एक सुर में गंभीर आरोप लगा रहे हैं, तो केवल कागजी आंकड़ों और स्लॉट बुकिंग की आड़ लेकर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और संभागीय आयुक्त इस बेलगाम कार्यप्रणाली पर कड़ा अंकुश लगाते हुए जाँच बैठाते हैं या फिर भ्रष्टाचार का यह खेल ऐसे ही जारी रहेगा।

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