राजस्व कार्यालयों की सुस्ती का खूनी परिणाम, मामूली जमीनी विवादों से गांवों में बन रहे रणक्षेत्र
Junaid Khan - शहडोल। राजस्व न्यायालयों और कार्यालयों में लंबित मामलों के प्रति प्रशासनिक उदासीनता और लेटलतीफी अक्सर आम नागरिकों को इस हद तक निराश कर देती है कि मामूली भूमि विवाद और सीमांकन के मुद्दे हिंसक और खूनी संघर्षों में बदल जाते हैं। फाइलों के निस्तारण में देरी के कारण गांवों और बस्तियों में खेत और अदालत की दहलीज़ें रणक्षेत्र बन रही हैं। राजस्व प्रकरणों की उदासीनता में किसी एक तहसील मुख्यालय की बात करना बेमानी होगी। जिले की समस्त तहसील मुख्यालयों में वर्षों से चल रहे राजस्व प्रकरणों में आज भी पीड़ित न्यायालय के चक्कर लगाते दिखाई देते हैं। खुद की जमीन को लेकर किसान कितने बेबस नज़र आते हैं, यह लगभग हर सुनवाई के दौरान न्यायालय में सहजता से देखे जा सकते हैं। वर्षों से चल रहे ज़मीनी विवाद में जब कोई ठोस निर्णय नहीं आता ऐसी स्थिति में ज़मीनी विवाद के कई मामले खूनी संघर्ष में बदल जाते है। कई मामलों में लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ती है। राजस्व मामलों में अंतिम निर्णय के इंतजार में न जाने कितने लोगों की आंखें धुंधला चुकी हैं। जिले में सैकड़ों की संख्या में ऐसे प्रकरण हैं, जिनके लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय के बाद भी निपटारे नहीं हो सके हैं। ऐसे में आप राजस्व विभाग के जिम्मेदार अफसरों की संवेदनशीलता का अनुमान लगा सकते हैं। जिले में सैकड़ों प्रकरणों में बुजुर्गों को सुनवाई के दौरान न्यायालय के चक्कर लगाते देखा जा सकता है। अब सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार अफसर अपने मां-बाप को ऐसे ही भटकते देख सकते हैं। क्या बुजुर्गों में अपने मां-बाप की छवि नहीं देख पा रहे जिम्मेदार। वास्तव में इस समाचार का उद्देश्य जिम्मेदार अफसरों के अंतर्मन को जगाने का छोटा सा प्रयास है। अब देखना यह होगा कि क्या आने वाले समय में इसका फ़र्क जिम्मेदार अफसरों पर पड़ेगा या नहीं, यह देखने वाली बात होगी।
