व्यवस्था की तानाशाही से जंग लड़ रहे डॉक्टर,सिविल सर्जन शिल्पी सराफ और अतिरिक्त अधीक्षक पूजा सोनी की मानवीयता से बच रही मरीजों की सांसें

व्यवस्था की तानाशाही से जंग लड़ रहे डॉक्टर,सिविल सर्जन शिल्पी सराफ और अतिरिक्त अधीक्षक पूजा सोनी की मानवीयता से बच रही मरीजों की सांसें 


Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल संभाग का सबसे प्रमुख शासकीय कुशाभाऊ ठाकरे जिला अस्पताल इन दिनों स्वास्थ्य विभाग की गंभीर नाकामी और घोर प्रशासनिक लापरवाही का शिकार है। कहने को तो यह संभाग का सबसे बड़ा अस्पताल है, जहां दूर-दराज के गरीब, असहाय और ग्रामीण मरीज आस लेकर पहुंचते हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि यहां जीवनरक्षक दवाओं का अकाल पड़ा हुआ है। जो मरीज प्राइवेट अस्पतालों का महंगा इलाज कराने में असमर्थ हैं, वे सरकारी चौखट पर सिर्फ इसलिए आ रहे हैं ताकि उन्हें समय पर दवा और इलाज मिल सके। परंतु दवा सप्लाई चेन की तानाशाही के कारण मरीजों को सीधी मौत के मुंह में धकेला जा रहा है। हाल ही में सामने आया मामला अस्पताल प्रबंधन की बदहाली और ऊपर बैठे जिम्मेदार तंत्र की पोल खोलने के लिए काफी है। अस्पताल में एक अति-गंभीर शुगर मरीज पहुंचा, जिसका शुगर लेवल 400 से 500 के पार रहता है। मरीज को तत्काल इंसुलिन (Insulin) इंजेक्शन की सख्त जरूरत थी, जिसके बिना उसकी जान जा सकती थी। जब उसे काउंटर से दवा नहीं मिली, तो उसने सिविल सर्जन डॉ. शिल्पी सराफ का दरवाजा खटखटाया। सिविल सर्जन डॉ. शिल्पी सराफ और अतिरिक्त अधीक्षक डॉ. पूजा सोनी ने संवेदनशीलता और मानवता का परिचय देते हुए तुरंत हरकत में आकर यहां-वहां से व्यवस्था कराकर मरीज को आपातकालीन स्थिति में इंसुलिन उपलब्ध कराया और उसकी जान बचाई। यह केवल एक उदाहरण नहीं है, बल्कि रोजाना की कहानी है जहां ये डॉक्टर खुद अपनी जेब से पैसे लगाकर या बुढार, जयसिंहनगर, अनूपपुर, व्यौहारी,गोहपारू और मेडिकल कॉलेज से दवाइयां ‘मांगकर’ मरीजों का इलाज कर रहे हैं।

भोपाल-दिल्ली में बैठे अफसरों की लापरवाही,04 महीने से पेंडिंग हैं ऑर्डर, ठेका-टेंडर प्रणाली में फंसा जनता का हक 

सवाल यह उठता है कि जब स्थानीय स्तर पर सिविल सर्जन, डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मचारी अपने कर्तव्य और फर्ज को निभाते हुए दिन-रात एक कर रहे हैं, तो आखिर खामी कहां है? सूत्रों की मानें तो भोपाल और दिल्ली में बैठे स्वास्थ्य विभाग के आला अफसर और टेंडर पाने वाली ठेकेदार कंपनियां इस पूरी अव्यवस्था की मुख्य जड़ हैं। अस्पताल प्रबंधन द्वारा बीते तीन से चार महीनों से दवाओं की मांग (Order Booking) भेजी जा चुकी है, लेकिन ऊपर बैठे अधिकारियों के ठंडे रवैये के कारण दवाइयों की खेप अब तक शहडोल नहीं पहुंची। आपातकालीन स्थितियों में एक्स्ट्रा दवाओं का बफर स्टॉक (Buffer Stock) होना अनिवार्य है, लेकिन यहां नियमित दवाएं तक नदारद हैं। इस प्रशासनिक तानाशाही का खामियाजा नीचे काम कर रहे डॉक्टरों और कर्मचारियों को भुगतना पड़ता है। जब दवा के अभाव में किसी मरीज की स्थिति बिगड़ती है या दुखद घटना होती है, तो आक्रोशित परिजन स्थानीय डॉक्टरों और कर्मचारियों से उलझते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि जिला अस्पताल की सिविल सर्जन डॉ. शिल्पी सराफ और अतिरिक्त अधीक्षक डॉ. पूजा सोनी जैसे अधिकारी खुद इस बदहाल व्यवस्था से लड़कर मरीजों को नया जीवन देने में जुटे हैं।

जिम्मेदारों को सीधा चैलेंज,यदि दवाएं नहीं पहुंचीं तो जनता और मीडिया मांगेगी जवाब

स्वास्थ्य सेवा में इस तरह की घोर लापरवाही सीधे-सीधे मानवाधिकारों का हनन है। शहडोल संभाग की जनता स्वास्थ्य मंत्रालय, टेंडर जारी करने वाले अधिकारियों और भोपाल में बैठे नीति-निर्माताओं को सीधे चुनौती देती है कि वे अपनी कुंभकर्णी नींद से जागें। यह टेंडर और कमीशनबाजी का खेल बंद होना चाहिए और तत्काल कुशाभाऊ ठाकरे अस्पताल में जीवनरक्षक दवाओं का आपातकालीन कोटा भेजा जाना चाहिए। यदि व्यवस्था में जल्द सुधार नहीं हुआ और दवा के अभाव में किसी मरीज की जान गई, तो इसकी पूरी जवाबदेही भोपाल-दिल्ली में बैठे उन स्वास्थ्य अधिकारियों की होगी जो एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर कागजी फाइलें दबाए बैठे हैं।

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