अस्पताल से पहले 'आपातकाल,मेडिकल कॉलेज मार्ग जर्जर,बेपरवाह अफसरों के दावों की खुली पोल

स्वास्थ्य मंत्री के प्रभार वाले जिले में बदहाल मुख्य सड़क, गड्ढों व जलभराव के बीच जिंदगी से जूझते मरीज,बेखबर बना जिम्मेदार तंत्र 


Junaid Khan - शहडोल। स्थानीय भगवान बिरसा मुंडा शासकीय मेडिकल कॉलेज का मुख्य प्रवेश द्वार अब इलाज की आस में आने वाले गंभीर मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं रह गया है। अस्पताल के मुख्य गेट के ठीक सामने की सड़क पूरी तरह ध्वस्त और जर्जर हो चुकी है, जहाँ बारिश का पानी भर जाने से बने गहरे गड्ढे राहगीरों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि इसी पहुँच मार्ग से रोजाना सैकड़ों गंभीर मरीज, एम्बुलेंस, विशेषज्ञ डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ और जिले की प्रशासनिक व्यवस्था हाँकने वाले तमाम आला अधिकारी गुजरते हैं। इसके बावजूद जिम्मेदार महकमों की आँखों पर बेपरवाही की पट्टी बंधी हुई है। एम्बुलेंस में तड़पते मरीजों को हिचकोले खिलाती यह जर्जर सड़क और जलभराव, शासन-प्रशासन के विकास और सुगम स्वास्थ्य सेवाओं के तमाम बड़े-बड़े दावों की धज्जियां उड़ा रहा है। चौंकाने वाला पहलू यह है कि शाहडोल जिला स्वयं प्रदेश के उपमुख्यमंत्री तथा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री राजेंद्र शुक्ल के प्रभार का जिला है। इसके बावजूद संभाग के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र के मुख्य द्वार की यह बदहाली, स्थानीय अफसरों की सुस्ती और जनसमस्याओं के प्रति संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को उजागर करती है। मेडिकल कॉलेज प्रबंधन के अनुसार, मुख्य गेट के आसपास अवैध अतिक्रमण और बेतरतीब दुकानों के जमावड़े के कारण चारों तरफ कचरा पसरा रहता है। इससे न केवल नाले-नालियां चोक होकर जलभराव पैदा कर रहे हैं, बल्कि सड़ते कचरे की भीषण बदबू से मरीजों का सांस लेना तक दूभर हो चुका है। प्रबंधन का दावा है कि अतिक्रमण हटाने और सड़क मरम्मत के लिए संबंधित प्रशासनिक विभागों को कई बार पत्राचार किया जा चुका है, लेकिन नगर पालिका से लेकर लोक निर्माण विभाग तक के जिम्मेदार अफसर कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं। सड़क की तत्काल मरम्मत, बेहतर जल निकासी और गंदगी के सफाए की मांग को लेकर आम नागरिकों और मरीजों के परिजनों का सब्र अब जवाब दे रहा है। मामले में मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. बी. जी. रामटेके का कहना है कि अव्यवस्थाओं को दूर कराने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक मरीजों को इलाज पाने से पहले इस नारकीय स्थिति से गुजरना पड़ेगा? जनहित के प्रति आंखें मूंदे बैठे जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों के लिए यह स्थिति एक सीधी चुनौती है—क्या तंत्र किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? यदि समय रहते जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी कार्यशैली सुधारकर धरातल पर ठोस कार्रवाई नहीं की, तो जनता के बढ़ते आक्रोश का जवाब देना प्रशासन के लिए आसान नहीं होगा।

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