मूलभूत सुविधाओं तरसतीं माता शबरी कन्या परिसर की छात्राएं 30 KM पैदल निकलीं कलेक्टर से गुहार लगाने
Junaid Khan - शहडोल। कटकोना शासकीय अमले की गंभीर लापरवाही और संवेदनशील प्रशासनिक तंत्र की दावों वाली व्यवस्था को धता बताते हुए जनजातीय अंचल की बेटियों ने अपने हक और बुनियादी अधिकारों के लिए जो निर्भीक कदम उठाया है, उसने जिले के पूरे प्रशासनिक अमले को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जिले के बुढ़ार विकासखंड अंतर्गत ग्राम कटकोना स्थित माता शबरी आवासीय कन्या शिक्षा परिसर में मूलभूत सुविधाओं के घोर अभाव और लगातार उपेक्षा से त्रस्त होकर दर्जनों आदिवासी छात्राएं एकजुट होकर छात्रावास की दीवारों से बाहर निकल आईं। अधिकारियों की अनदेखी और बंद कमरों में दम तोड़ती शिकायतों से आहत होकर इन साहसी छात्राओं ने चुप बैठने के बजाय सीधे जिला कलेक्टर से मिलकर अपनी आपबीती सुनाने का ऐतिहासिक फैसला किया और लगभग 30 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय की ओर पैदल ही मार्च शुरू कर दिया। छात्राओं का स्पष्ट और कड़ा आरोप था कि बार-बार गुहार लगाने और लिखित शिकायतें देने के बावजूद हॉस्टल में बिजली की आवाजाही और पीने के स्वच्छ पानी जैसी प्राथमिक समस्याओं का निराकरण करने में जिम्मेदार पूरी तरह नाकाम रहे। इसके अतिरिक्त, छात्राओं ने अपने शैक्षणिक भविष्य की चिंता जताते हुए परीक्षा परिणाम बेहतर कराने में समर्पित भाव से योगदान देने वाले एक लोकप्रिय शिक्षक को यथावत पदस्थ रखने की पुरजोर और जायज मांग रखी। बेटियों का यह अप्रत्याशित और सशक्त विरोध जैसे ही मुख्य मार्ग पर दिखा, वैसे ही एसी कमरों में बैठे प्रशासनिक अधिकारियों में अचानक हड़कंप मच गया और जिले की पूरी व्यवस्था के हाथ-पांव फूल गए। इतनी बड़ी संख्या में छात्राओं का सड़क पर उतर आना न केवल हॉस्टल प्रबंधन की घोर लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह विभाग की उस लचर निगरानी व्यवस्था पर भी करारा तमाचा है जो हर वर्ष करोड़ों का बजट कागजों में खपा देती है। घटना की भनक लगते ही आनन-फानन में जिला पंचायत सीईओ शिवम प्रजापति और जनजातीय कार्य विभाग के सहायक आयुक्त आनंद राय सिन्हा को मौके पर दौड़ लगानी पड़ी। सड़क के बीचों-बीच छात्राओं को रोककर जब अधिकारियों ने बातचीत की, तो उन्हें छात्राओं के आक्रोश और वाजिब सवालों का सामना करना पड़ा। हालांकि, अधिकारियों ने जल्द समाधान का रटा-रटाया आश्वासन देकर मामला शांत कराया और छात्राओं को वापस परिसर भेजा, लेकिन इस घटना ने कई अनुत्तरित और तीखे सवाल छोड़ दिए हैं। आखिर जिम्मेदार अधिकारी और हॉस्टल वार्डन किस गहरी नींद में सोए थे कि दर्जनों बेटियां मुख्य सड़क तक बिना किसी रोक-टोक के पहुंच गईं? क्या प्रशासन को किसी अनहोनी का इंतजार था? बेटियों का यह अनुकरणीय और साहसिक कदम जहां एक ओर उनकी अपने अधिकारों के प्रति अटूट जागरूकता और हिम्मत की तारीफ करने पर मजबूर करता है, वहीं दूसरी ओर यह शासन व जनजाति कार्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के लिए एक खुली चुनौती है कि वे खोखले दावों से बाहर निकलकर व्यवस्था में जमीनी सुधार करें और बेटियों की हर वाजिब मांग को तत्काल पूरा करें, वरना आने वाले समय में यह जनाक्रोश प्रशासनिक साख को पूरी तरह ढहा देगा।
