जैतपुर के गलहथा में बदहाली से तंग आकर जनता का अनूठा सत्याग्रह'ट्रिपल इंजन' सरकार की दावों की खुली पोल,पक्ष-विपक्ष की चुप्पी पर जन-आक्रोश
Junaid Khan - शहडोल। "सबका साथ, सबका विकास" और "बदलता मध्य प्रदेश" के बड़े-बड़े विज्ञापनों और चुनावी मंचों से पीटे जाने वाले विकास के ढोल की असली जमीनी हकीकत देखनी हो, तो जैतपुर विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत गलहथा के वार्ड नंबर 15 में आ जाइए। यहाँ तथाकथित 'विकास की गंगा' इतनी उफान पर है कि मुख्य सड़क पूरी तरह कीचड़, दलदल और धान के खेत में तब्दील हो चुकी है। बीते 30 सालों से (तीन दशकों से) पक्की सड़क का मुंह ताक रहे ग्रामीणों के सब्र का बांध जब टूटा, तो उन्होंने प्रशासनिक अमले, सुस्त नेताओं और बेपरवाह जनप्रतिनिधियों को आइना दिखाने के लिए ऐसा अनोखा और तीखा व्यंग्यात्मक तरीका अपनाया कि पूरे महकमे में हड़कंप मच गया। जर्जर और कीचड़ से लबालब रास्ते पर आक्रोशित ग्रामीणों ने बाकायदा विरोध प्रदर्शन करते हुए धान का रोपा लगा दिया। वार्ड 15 को मुख्य मार्ग और गांव के एकमात्र स्कूल से जोड़ने वाला यह आधा किलोमीटर (500 मीटर) का रास्ता स्थानीय निवासियों, बुजुर्गों, मरीजों और मासूम स्कूली बच्चों के लिए रोज की अग्निपरीक्षा बन चुका है। पहली ही मानसूनी बारिश में यह मार्ग दलदली ताल-तलैया का रूप ले लेता है, जहाँ रोज नन्हे बच्चे गिरकर चोटिल हो रहे हैं। तीन दशकों से पंचायत से लेकर जिला प्रशासन के आला अधिकारियों और क्षेत्रीय नेताओं के दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक चुके ग्रामीणों का गुस्सा अब फूट पड़ा है।
वादों की घुट्टी पिलाने वाले नेता-मंत्री और सुस्त अफसरशाह कटघरे में
अचरज और मजे की बात तो यह है कि केंद्र से लेकर मध्य प्रदेश शासन और स्थानीय विधानसभा क्षेत्र तक में भारतीय जनता पार्टी की 'ट्रिपल इंजन' सरकार का राज है। सत्ताधारी दल के सांसद, विधायक, मंत्री और अध्यक्ष आए दिन विकास के नए-नए कीर्तिमान गढ़ने के लंबे-चौड़े दावे ठोकते हैं, लेकिन गलहथा गांव की यह 500 मीटर की दलदली सड़क उन सभी दावों की धज्जियां उड़ा रही है। चुनाव आते ही जनता को झूठे आश्वासनों की घुट्टी पिला दी जाती है, पर चुनाव खत्म होते ही जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार अफसर जनता को इसी बदहाली और कीचड़ में घिसटने के लिए छोड़ देते हैं। वहीं दूसरी ओर, विपक्ष में बैठी कांग्रेस पार्टी भी अपनी परंपरागत 'सुसुप्त अवस्था' में लीन है। जनहित के इस गंभीर मुद्दे पर न तो सांसद-विधायक ने सुध ली और न ही विपक्षी नेताओं ने सड़क पर उतरने की जहमत उठाई। ऐसा प्रतीत होता है कि चुनाव खत्म होते ही पक्ष और विपक्ष, दोनों के लिए आम जनता का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जिला प्रशासन के जिम्मेदार लोक निर्माण विभाग (PWD), ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) और पंचायत विभाग के अफसर कागजी फाइलों और बजट के खेल में उलझे हुए हैं, जबकि जमीन पर आम नागरिक नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।
जनता के साहसिक विरोध से सहमा प्रशासन,पंचायत ने बजट का रोना रोया
कीचड़ भरे गड्ढों में खड़े होकर धान रोपते हुए ग्रामीण नवल सिंह, प्रहलाद सिंह और सुरेश सिंह सहित दर्जनों ग्रामीणों ने सोए हुए हुक्मरानों और बेपरवाह अफसरों पर करारा तंज कसा। ग्रामीणों ने साहसिक लहजे में कहा कि जब शासन, प्रशासन और बड़े-बड़े नेताओं को 30 साल में सड़क और खेत का फर्क समझ में नहीं आया, तो हमने भी सड़क को खेत मानकर धान रोप दिया है। कम से कम जब धान की फसल तैयार होगी, तो उसे बेचकर मिलने वाले अनाज से हम ग्रामीण अपनी तकलीफों और आर्थिक नुकसान की भरपाई तो कर सकेंगे। ग्रामीणों के इस तीखे, अनोखे और गांधीवादी विरोध ने जिला प्रशासन के विकास के खोखले दावों को सरेराह नंगा कर दिया है। अब क्षेत्र में चर्चा है कि क्या इस 'धान रोपाई सत्याग्रह' के बाद बेपरवाह कलेक्टर, जनपद सीईओ और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों की नींद टूटेगी, या गलहथा के निर्दोष नागरिक ऐसे ही प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार बने रहेंगे?
इनका कहना है
"सड़क की समस्या पंचायत के संज्ञान में है। ग्राम सभा में कई बार सड़क निर्माण का प्रस्ताव रखा गया है और बजट को लेकर चर्चा भी हुई है। बारिश समाप्त होने के बाद सड़क निर्माण कार्य शुरू कराया जाएगा।
चंद्रशेखर तिवारी, सचिव, ग्राम पंचायत गलहथा
