35 साल की निष्ठा का यह कैसा सिला? चतुर्थ क्रमोन्नत वेतनमान की फाइल अफसरों के दफ्तरों में फांक रही धूल

आश्वासन के 10 दिन बीते, आदेश गायब,रिटायर्ड शिक्षक पेंशन के लिए काट रहे दफ्तरों के चक्कर, क्या जागेगा बेपरवाह प्रशासन?

लापरवाही की हदें पार,70 से अधिक शिक्षकों का हक दबाकर बैठा जिला शिक्षा विभाग 


Junaid Khan - शहडोल। मध्य प्रदेश शासन शिक्षा विभाग ने 35 वर्ष की निर्बाध सेवा पूर्ण करने वाले शिक्षक संवर्ग को जुलाई 2023 से चतुर्थ क्रमोन्नत वेतनमान का लाभ देने का स्पष्ट फरमान जारी किया था। प्रदेश के अन्य जिलों में यह आदेश जमीनी धरातल पर उतर चुका है और वहां के शिक्षकों को इसका लाभ भी मिल रहा है। इसके विपरीत, शहडोल जिले में जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय की घोर उदासीनता और निष्क्रियता के कारण यह प्रक्रिया पूरी तरह ठप पड़ी है। हालत यह है कि चतुर्थ क्रमोन्नत वेतनमान के प्रस्ताव 25 अप्रैल 2026 तक मंगवाए गए थे, लेकिन चार महीने का लंबा समय बीत जाने के बाद भी फाइलें धूल चाट रही हैं। जिले के 70 से अधिक पीड़ित शिक्षक अपने जायज हक के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। सबसे दर्दनाक स्थिति उन सेवानिवृत्त शिक्षकों की है, जिनकी पेंशन प्रक्रिया सिर्फ इसलिए अटकी हुई है क्योंकि विभाग चतुर्थ क्रमोन्नत वेतनमान का अंतिम आदेश जारी नहीं कर रहा है। जीवन भर समाज की नींव मजबूत करने वाले ये वयोवृद्ध शिक्षक अब अपनी ही गाढ़ी कमाई और पेंशन का लाभ पाने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की चौखट पर गिड़गिड़ाने को विवश हैं।

कलेक्टर दफ्तर से अपर कलेक्टर तक फाइल में फंसा पेच,वरिष्ठ नागरिकों का फूटा गुस्सा 

प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह है कि शिक्षा विभाग ने फाइल तो जैसे-तैसे आगे बढ़ाई, लेकिन अब वह जिला प्रशासन की लालफीताशाही का शिकार बन चुकी है। बताया जा रहा है कि फाइल अनुमोदन (अनुमोदन) के लिए कलेक्टर कार्यालय भेजी गई है, जहां अपर कलेक्टर सरोधन सिंह द्वारा परीक्षण किए जाने के नाम पर मामला पिछले एक सप्ताह से अधर में लटका हुआ है। डीईओ अतुल चौधरी का 'आश्वासन' सिर्फ कागजी जुमला साबित हुआ है; 10 दिन का समय बीत जाने के बाद भी कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। जिले का केवल ब्यौहारी ब्लॉक ही शिक्षा विभाग के सीधे अधीन आता है, इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर इतनी बड़ी लापरवाही बेहद चिंताजनक है। इस मुद्दे पर वरिष्ठ नागरिक पेंशन एसोसिएशन ने भी अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और ज्ञापन सौंपकर जल्द से जल्द आदेश जारी करने की मांग उठाई है। मगर, ऐसा प्रतीत होता है कि जिम्मेदार अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है।

शासकीय तंत्र की इस तानाशाही पर कब जागेगी सरकार और उच्चाधिकारी?

आखिर कब तक जिम्मेदार अधिकारी नियमों का हवाला देकर और फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल सरकाकर शिक्षकों के भविष्य से खिलवाड़ करते रहेंगे? क्या प्रदेश की संवेदनशील सरकार और शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारी शहडोल के इस प्रशासनिक ढुलमूल रवैये का संज्ञान लेंगे? एक तरफ सरकार कर्मचारियों के कल्याण के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ मैदानी स्तर पर बैठे अफसर शासकीय आदेशों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की कार्यशैली और कलेक्टर/अपर कलेक्टर स्तर पर हो रही देरी पर उठता है। यदि शीघ्र ही 35 साल की सेवा दे चुके इन शिक्षकों के चतुर्थ क्रमोन्नत वेतनमान के आदेश जारी नहीं किए गए और सेवानिवृत्त कर्मचारियों की अटकी पेंशन शुरू नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में यह प्रशासनिक लापरवाही एक बड़े जनांदोलन का रूप ले सकती है। शासन और प्रशासन को तुरंत हस्तक्षेप कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए, ताकि बेबस शिक्षकों को उनका हक मिल सके।

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