जेके सीमेंट की कोयला खदान का पुरजोर विरोध, ग्रामीणों ने खोली शासन-प्रशासन के रवैये की पोल
Junaid Khan - शहडोल। उमरिया क्षेत्रीय पर्यावरण, जन-जीवन और भविष्य को दांव पर लगाकर उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के प्रशासनिक खेल पर ग्रामीणों ने कड़ा प्रहार किया है। मेसर्स जेके सीमेंट लिमिटेड को ग्राम अमलिहा, भिम्माडोंगरी, महरोई, बांधवाबारा, कन्नावहरा, देवगवां, चंदनियां खुर्द, बांधवाखुर्द एवं बरगवां क्षेत्र में आवंटित अंडरग्राउंड कोयला खदान की पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए आयोजित 'लोक सुनवाई' महज़ एक औपचारिक रस्म अदायगी बनकर रह गई। शुक्रवार को सुबह 11 बजे से दोपहर 3:30 बजे तक चली इस सुनवाई में प्रभावित ग्रामीणों ने जिस एकजुटता, जागरूकता और निडरता का परिचय दिया, उसने कंपनी के नुमाइंदों के साथ-साथ मौके पर मौजूद अधिकारियों की बोलती बंद कर दी। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) के क्षेत्रीय अधिकारी डॉ. अशोक तिवारी और जिला प्रशासन उमरिया के अपर कलेक्टर प्रमोद सेन गुप्ता की मौजूदगी में ग्रामीणों ने बेबाकी से आरोप लगाया कि विकास के नाम पर यह परियोजना क्षेत्र के पर्यावरण, जल-जंगल-जमीन और स्थानीय लोगों के वजूद को पूरी तरह तबाह कर देगी।
मौन साधे बैठे रहे जिम्मेदार अधिकारी, ग्रामीणों ने दिखाई जागरूक नागरिकता की मिसाल जनता की सुरक्षा और अधिकारों के संरक्षक बने बैठने वाले जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी लोक सुनवाई के दौरान मूकदर्शक बने रहे। अधिकारियों के इस ढुलमुल रवैये को चुनौती देते हुए ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा कि अगर खदान खोली गई तो भूजल स्तर पाताल में चला जाएगा, जिससे क्षेत्र के कुएं, तालाब और जलस्रोत सूख जाएंगे। वनाच्छादित क्षेत्र होने के कारण पेड़-पौधों और जैविक विविधता पर विनाशकारी असर पड़ेगा। ग्रामीणों ने अधिकारियों और कंपनी प्रबंधन की मंशा पर सवाल उठाते हुए दोटूक कहा कि पूर्व में आई कंपनियां खदान शुरू होने से पहले स्थानीय युवाओं को रोजगार का झुनझुना थमाती हैं, लेकिन बाद में बाहरी लोगों को लाकर भर लिया जाता है। कम पढ़े-लिखे व अनपढ़ ग्रामीणों के लिए कंपनी की कोई स्पष्ट नीति न होना यह साबित करता है कि पूंजीपतियों की नजर सिर्फ यहां के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने पर है। ग्रामीणों का यह प्रखर विरोध यह चेतावनी है कि अब जनता अपने अधिकारों की बलि चढ़ने नहीं देगी। 0.70 मिलियन टन सालाना उत्पादन की आड़ में बड़े विनाश की तैयारी, उठे गंभीर सवालहालांकि जेके सीमेंट लिमिटेड की ओर से विकास दुबे ने दावा किया कि खदान की वार्षिक उत्पादन क्षमता 0.70 मिलियन टन होगी और सुनवाई शांतिपूर्वक संपन्न हुई, वहीं प्रशासनिक अफसरों ने आपत्तियों को 'उच्च अधिकारियों को भेजने' की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की। लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि जब पर्यावरण और सामान्य जन-जीवन पर इतना भीषण संकट मंडरा रहा है, तो मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संबंधित जिला प्रशासन आखिर किसके इशारे पर इस विनाशकारी योजना की राह हमवार कर रहे हैं? क्या जिम्मेदार अधिकारी केवल बंद कमरों में एसी का आनंद लेकर कागजी खानापूर्ति करने के लिए हैं? ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी एक-एक आपत्ति का जमीनी स्तर पर पारदर्शी निराकरण नहीं होता और रोजगार की लिखित नीति सामने नहीं आती, तब तक खदान की प्रक्रिया को एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा। यदि प्रशासन ने जनभावनाओं को दरकिनार कर जबरन खदान थोपने की कोशिश की, तो यह जनाक्रोश आने वाले दिनों में उग्र आंदोलन का रूप ले सकता है।
