लाखों स्वाहा,व्यवस्था ठप,जिम्मेदारों की आपराधिक चुप्पी से चौराहों पर मंडरा रहा मौत का साया

दो साल से बंद पड़े सिग्नल, क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा जिला प्रशासन,पुलिस और नगर पालिका प्रशासन? लापरवाही और अनदेखी का अड्डा बने प्रमुख चौराहे


Junaid Khan - शहडोल। शहर की चरमराती यातायात व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनहीनता अब आम जनता की जान पर भारी पड़ने लगी है। शहर को आधुनिक और सुरक्षित यातायात ढांचा देने का दावा करके लाखों रुपये की सरकारी धनराशि से लगाए गए ट्रैफिक सिग्नल बीते दो वर्षों से केवल शो-पीस बनकर रह गए हैं। रखरखाव और देखरेख के सर्वथा अभाव में ये महंगे सिग्नल अब जर्जर और कबाड़ में तब्दील हो चुके हैं। आंबेडकर चौक, जेल बिल्डिंग चौराहा, गांधी चौक और इंदिरा चौक जैसे शहर के बेहद व्यस्ततम और मुख्य चौराहों पर प्रतिदिन हजारों वाहनों की आवाजाही होती है, लेकिन यहाँ कोई ठोस यातायात प्रबंधन नज़र नहीं आता। सुबह और दोपहर में जब स्कूलों की छुट्टियाँ होती हैं, तब स्थिति बेहद भयावह रूप ले लेती है। स्कूल बसों, वैन, दोपहिया और चारपहिया वाहनों की लंबी-लंबी कतारों में मासूम बच्चों से लेकर आम राहगीर घंटों फँसे रहते हैं। शहर का पूरा यातायात अब केवल वाहन चालकों की खुद की समझदारी और किस्मत के भरोसे चल रहा है।

शासकीय धन का दुरुपयोग और जिम्मेदार महकमों की नाकामी

जनता के टैक्स के पैसों से लाखों रुपये की लागत से स्थापित इन सिग्नलों का बंद पड़ा रहना सीधे तौर पर जिला प्रशासन, यातायात पुलिस और नगर पालिका परिषद की घोर नालायकी व आपराधिक लापरवाही को उजागर करता है। एक तरफ जहाँ सरकारी खजाने से विकास के नाम पर बजट का बंदरबांट कर दिया गया, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं की समय पर मरम्मत कराना किसी भी जिम्मेदार अधिकारी की प्राथमिकता में शामिल नहीं है। न तो नगर पालिका को इस बात की चिंता है कि उसकी संपत्ति जर्जर हो रही है, और न ही यातायात पुलिस विभाग सड़कों पर सुगम आवागमन सुनिश्चित कराने में दिलचस्पी दिखा रहा है। स्थानीय लोगों द्वारा बार-बार ध्यानाकर्षण कराए जाने के बावजूद किसी भी अधिकारी के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही। बंद सिग्नलों के कारण न केवल आए दिन छोटे-बड़े सड़क हादसे हो रहे हैं, बल्कि ट्रैफिक जाम की समस्या से हर वर्ग त्रस्त हो चुका है।

जिम्मेदार अधिकारियों को सीधा सवाल,कब जागेगा कुंभकर्णी प्रशासन? 

आख़िर इस व्यवस्था का असली जिम्मेदार कौन है? क्या यातायात पुलिस, नगर पालिका और जिला प्रशासन के बड़े अधिकारी केवल कागजी बैठकों और खोखले दावों तक सीमित रह गए हैं? यदि इन सिग्नल तंत्रों को चालू करने की नीयत होती, तो दो साल का लंबा समय कम नहीं होता। शहर की जनता अब खुले तौर पर यह सवाल पूछ रही है कि किसी मासूम की जान जाने के बाद ही क्या जिम्मेदारों की नींद टूटेगी? यदि शासकीय राशि का इस तरह दुरुपयोग किया गया है, तो दोषी अधिकारियों पर सीधी कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही? शहरवासियों की स्पष्ट माँग है कि आंबेडकर चौक, गांधी चौक, इंदिरा चौक और जेल बिल्डिंग चौराहे समेत सभी प्रभावित स्थानों के सिग्नलों को तत्काल दुरुस्त कर चालू किया जाए। यदि जल्द ही इन अव्यवस्थाओं को सुधारकर सुचारू यातायात बहाल नहीं किया गया, तो उग्र जन-आंदोलन की जिम्मेदारी सीधे तौर पर निष्क्रिय प्रशासनिक अमले की होगी।

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