28 साल से जारी फर्जीवाड़े में राजस्व व वन विभाग के गठजोड़ का भांडाफोड़,जांच के बाद भी जिम्मेदारों पर मेहरबानी
Junaid Khan - शहडोल। जिले की गोहपारू तहसील अंतर्गत ग्राम दियापीपर में वन विभाग की 300 करोड़ रुपये मूल्य की बेशकीमती शासकीय भूमि को निगलने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। लगभग तीन दशक (28 साल) से जारी इस सुनियोजित फर्जीवाड़े का खुलासा कमिश्नर के कड़े रुख के बाद पटवारी द्वारा सौंपी गई जांच रिपोर्ट से हुआ है। चौंकाने वाली बात यह है कि सरकारी जंगलों की इस जमीन के फर्जी पट्टे बनाकर इसे भू-माफियाओं और अधिकारियों के चहेतों को बार-बार बेचा गया, लेकिन तहसील व राजस्व अमला आंखें मूंदकर बैठा रहा। मुख्य मार्ग से लगी इस कीमती जमीन के फर्जीवाड़े में यह स्पष्ट हो चुका है कि बिना प्रशासनिक शह और विभागीय साठगांठ के इतना बड़ा घोटाला संभव नहीं था। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जांच रिपोर्ट में धांधली की परतें खुलने के बाद भी अब तक दोषी अधिकारियों और भू-माफियाओं पर कठोर आपराधिक मामला दर्ज कर जेल भेजने की कार्रवाई क्यों नहीं की गई? फर्जी दस्तावेज, बंटांक का खेल और नामांतरण की अंधी दौड़ जांच में उजागर हुआ कि ग्राम दियापीपर का खसरा नंबर 703/1 (कुल रकबा 67.60 एकड़ / 27.114 हेक्टेयर) शासकीय रिकॉर्ड में वन विभाग की आरक्षित भूमि दर्ज है। भू-माफियाओं ने राजस्व कर्मचारियों के साथ मिलकर इसमें से 4.95 एकड़ (2.004 हेक्टेयर) भूमि का फर्जी पट्टा प्रकरण क्रमांक 197/अ-19(4)/1990-91 (दिनांक 15.04.1991) दर्शाकर सारिका प्रकाश के नाम पर दर्ज करा दिया। जिला अभिलेखागार की जांच में यह फर्जीवाड़ा पकड़ा गया कि यह प्रकरण क्रमांक वास्तव में ग्राम सरसी के एक आवेदक का था जो वर्षों पहले खारिज हो चुका था। शासन द्वारा ऐसा कोई पट्टा जारी ही नहीं किया गया था। शातिर आरोपियों ने रिकॉर्ड में हेरफेर करने के लिए खसरा 703/1 से नया बंटांक 703/5 तो बनाया, लेकिन मूल रकबा वही रहने दिया ताकि किसी की नजर इस गड़बड़ी पर न पड़े। इसके बाद सरकारी जमीन को अपनों में बेचने का सिलसिला शुरू हुआ तहसीलदार के पुत्र से लेकर अन्य रिश्तेदारों तक नामांतरण का यह काला खेल बेखौफ चलता रहा। साइबर चेतावनियों को दरकिनार कर दिया गया मुआवजा हड़पने का खेल इस पूरे आपराधिक षड्यंत्र का मुख्य उद्देश्य राज्य मार्ग SH-57 (टेटका-शहडोल मार्ग) के चौड़ीकरण में अधिग्रहित हो रही 0.066 हेक्टेयर जमीन का सरकारी मुआवजा हड़पना था। जब यह मामला ऑनलाइन पोर्टल 'साइबर 1.0' पर पहुंचा, तो पटवारी ने स्पष्ट रूप से चौहद्दी का मिलान न होने और गंभीर कानूनी अड़चनों की रिपोर्ट भेजी थी। इसके बावजूद, तत्कालीन तहसीलदार और राजस्व निरीक्षक ने पुराने अभिलेखों की जांच करना तक मुनासिब नहीं समझा और आंखें बंद करके नामांतरण को मंजूरी दे दी। भू-अर्जन अधिनियम 2013 की धारा 11 के तहत मुआवजा रोकने की अनुशंसा तो कर दी गई है, लेकिन असली गुनहगारों, तत्कालीन तहसीलदारों और राजस्व अधिकारियों पर चुप्पी साध ली गई है। प्रशासनिक अक्षमता का आलम यह है कि कमिश्नर के निर्देश के बाद भी मामला अब ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है, जिससे साफ जाहिर होता है कि इस 300 करोड़ के घोटाले के तार प्रशासनिक गलियारों में काफी गहरे जुड़े हुए हैं।
