हरछठ पर बढ़ी पडोरा की मांग, जंगल और खेतों की मेड़ों पर उगने वाली सब्जी बनी आकर्षण का केंद्र

धार्मिक परंपरा के चलते देसी पडोरा की बढ़ी मांग, बाजार में 320 रुपये किलो तक पहुंचे दाम


Junaid Khan - शहडोल। 02 सितम्बर 2026- विंध्य क्षेत्र में हरछठ पर्व का विशेष धार्मिक एवं पारंपरिक महत्व है। पर्व के अवसर पर व्रती महिलाओं द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करते हुए पूजा-अर्चना की जाती है। इसी परंपरा के चलते हरछठ के अवसर पर पडोरा की मांग बढ़ गई है। प्राकृतिक रूप से जंगल, पहाड़ों तथा खेत एवं तालाब की मेड़ों पर उगने वाले पडोरा को हरछठ के अवसर पर विशेष रूप से उपयोग में लाया जाता है। हरछठ की तैयारियों के बीच शहडोल के बाजारों में देसी एवं जंगली पडोरा की मांग में तेजी देखी गई। बड़ी संख्या में महिलाएं पडोरा की तलाश करती नजर आईं। स्थानीय महिलाओं के अनुसार हरछठ के दिन ऐसी वनस्पतियों एवं उत्पादों का सेवन करने की परंपरा है, जो बिना हल चलाए प्राकृतिक रूप से उगते हैं। इसी वजह से देसी पडोरा का इस पर्व पर विशेष महत्व माना जाता है।

मांग बढ़ने से बाजार में बढ़े पडोरा के दाम

हरछठ से पहले पडोरा की मांग बढ़ने के कारण इसके बाजार भाव में भी वृद्धि हुई। सामान्य दिनों में पडोरा लगभग 200 से 240 रुपये प्रति किलो तक उपलब्ध रहता है। वहीं हरछठ के अवसर पर देसी एवं छोटे आकार के पडोरा की कीमत बढ़कर करीब 80 रुपये प्रति पाव, अर्थात लगभग 320 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। स्थानीय सब्जी विक्रेता रामप्रताप साहू के अनुसार हरछठ के एक दिन पहले देसी पडोरा की विशेष मांग रहती है। अलग-अलग स्थानों पर इसकी कीमत आकार एवं गुणवत्ता के अनुसार अलग-अलग रही। कहीं 240 रुपये, तो कहीं 250 से 320 रुपये प्रति किलो तक पडोरा की बिक्री हुई।

हरछठ की परंपरा से जुड़ा है पडोरा 

ज्योतिष आचार्य पंडित सुशील शुक्ला शास्त्री ने बताया कि हरछठ पर्व पर व्रती महिलाएं कई प्रकार के नियमों का पालन करती हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन हल या कृषि उपकरणों से जुताई वाले स्थानों पर उगी फसलों के स्थान पर प्राकृतिक रूप से उगने वाले वन उत्पादों एवं फल-सब्जियों का उपयोग किया जाता है। पडोरा जंगल, पहाड़ों तथा खेतों एवं तालाबों की मेड़ों पर स्वतः उगता है, इसलिए इसे हरछठ की परंपरा के अनुरूप माना जाता है। उन्होंने बताया कि हरछठ के अवसर पर पडोरा का सेवन करने और पूजा में इसका उपयोग करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। बरसात के मौसम में उपलब्ध होने वाला यह प्राकृतिक उत्पाद स्थानीय खान-पान और ग्रामीण परंपराओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

प्राकृतिक उत्पादों के प्रति बढ़ रहा रुझान 

हरछठ पर्व के अवसर पर पडोरा की बढ़ती मांग से स्थानीय स्तर पर प्राकृतिक रूप से उपलब्ध वनस्पतियों एवं पारंपरिक खाद्य पदार्थों के प्रति लोगों का जुड़ाव भी दिखाई देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी अनेक परिवार मौसम के अनुरूप उपलब्ध होने वाले प्राकृतिक उत्पादों का उपयोग करते हैं। पडोरा इसी पारंपरिक खान-पान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

Previous Post Next Post