अध्यक्ष की मनमानी और प्रशासनिक सुस्ती से ठप हुई व्यवस्था,फुकेत में मौज और शहर में जल संकट

हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी सीएमओ को नहीं मिला बैंकिंग प्रभार,जिम्मेदार अधिकारियों की खामोशी पर उठे गंभीर सवाल 


Junaid Khan - शहडोल। प्रशासनिक लापरवाही, जनप्रतिनिधियों की तानाशाही और विभागीय अनदेखी के चलते शहडोल शहर की मूलभूत नागरिक व्यवस्थाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं। हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद 1 सितंबर को नगर पालिका सीएमओ का पदभार ग्रहण करने वाली आशा भंडारी को जॉइनिंग के 8 दिन बीत जाने के बाद भी अब तक बैंकिंग प्रभार नहीं दिया गया है। इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला और गैर-जिम्मेदाराना पहलू यह है कि नगर पालिका अध्यक्ष घनश्याम जायसवाल ने हस्ताक्षर प्रमाणीकरण करने से साफ इंकार कर दिया और वित्तीय फाइलों को अधर में लटकाकर 3 सितंबर को विदेश यात्रा (फुकेत) के लिए रवाना हो गए। जनप्रतिनिधि के इस रवैये और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों की ढुलमुल कार्यशैली के कारण आज पूरा शहर पेयजल संकट, सड़कों के गड्ढों और साफ-सफाई जैसी अति-आवश्यक सुविधाओं के लिए तरस रहा है। सीएमओ आशा भंडारी द्वारा बैंकिंग प्रभार प्राप्त करने हेतु आवश्यक दस्तावेज तैयार कर अध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे, लेकिन उन पर हस्ताक्षर करने के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इस प्रशासनिक अड़ंगेबाजी से आहत सीएमओ ने 4 सितंबर को संयुक्त संचालक (जेडी) नगरीय प्रशासन एवं विकास शहडोल को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराया और त्वरित कार्रवाई की गुहार लगाई। इसके बावजूद जिम्मेदार संभागीय व राज्य स्तरीय अधिकारियों ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। यह स्थिति न केवल उच्च न्यायालय के आदेशों की सीधी अवहेलना और अवमानना की श्रेणी में आती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे व्यक्तिगत रंजिश और राजनीतिक खींचतान के चक्कर में जनता के मौलिक अधिकारों की बलि दी जा रही है। बैंकिंग अधिकार न मिलने का सीधा असर शहर की जीवनरेखा माने जाने वाले फिल्टर प्लांट पर पड़ रहा है। पेयजल के शुद्धिकरण के लिए अति-आवश्यक रसायन 'फिटकरी' (एलम) की आपूर्ति पूरी तरह ठप हो चुकी है, जिससे शहरवासियों के स्वास्थ्य पर सीधे तौर पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। इतना ही नहीं, सड़कों के गड्ढे भरने, सफाई व्यवस्था बनाए रखने और दैनिक प्रशासनिक कार्यों के भुगतान रुक जाने से आम जनता छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। हाईकोर्ट के आदेश का पालन कराने में पंगु साबित हो रहे जिम्मेदार अधिकारियों की यह चुप्पी कई बड़े सवाल खड़े करती है। यदि शासन-प्रशासन ने इस पूरे मामले में अविलंब संज्ञान लेकर वित्तीय अधिकारों का हस्तांतरण नहीं कराया, तो आने वाले दिनों में शहर एक बड़े नागरिक और स्वास्थ्य संकट की चपेट में होगा।

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