कलेक्ट्रेट परिसर बना अव्यवस्थाओं का केंद्र,पार्किंग के अभाव में राहगीर व फरियादी परेशान

जर्जर भवन के बहाने साधी चुप्पी,पुलिस-यातायात और जिला प्रशासन की लापरवाही से कलेक्ट्रेट में हर दिन लग रहा जाम


Junaid Khan - शहडोल। जिला मुख्यालय स्थित कलेक्ट्रेट परिसर, जो पूरे जिले की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, इन दिनों गंभीर अव्यवस्था और प्रशासनिक अनदेखी का शिकार हो चुका है। जिले भर से रोजाना अपनी समस्याओं के समाधान हेतु पहुंचने वाले सैकड़ों ग्रामीण, फरियादी और स्वयं विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी पार्किंग की समुचित व्यवस्था न होने से भारी फजीहत झेलने को मजबूर हैं। कलेक्ट्रेट भवन के बाहरी हिस्से के जर्जर होने का हवाला देकर प्रशासन ने अंदर वाहनों के प्रवेश पर तो रोक लगा दी, लेकिन इसके बदले वैकल्पिक व व्यवस्थित पार्किंग का कोई इंतजाम नहीं किया गया। नतीजा यह है कि नीम और बरगद के पेड़ों के नीचे, संकरे रास्तों और कलेक्ट्रेट के मुख्य द्वार तक दोपहिया व चारपहिया वाहन बेतरतीब ढंग से खड़े किए जा रहे हैं। जिला कलेक्टर, एसपी कार्यालय, खनिज विभाग, रजिस्ट्री कार्यालय और तहसील से जुड़े कार्यों के लिए आने वाले लोगों को अपने वाहन खड़े करने के लिए घंटों जगह तलाशनी पड़ती है, जिससे हर समय दुर्घटना और विवाद की स्थिति बनी रहती है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने का ढिंढोरा पीटने वाला पुलिस व यातायात विभाग तथा जिला प्रशासन इस गंभीर समस्या पर आंखें मूंदे क्यों बैठा है? नियमों का पाठ पढ़ाने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की नाक के नीचे कलेक्ट्रेट परिसर रोज जाम की चपेट में रहता है, लेकिन यातायात पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है। कलेक्ट्रेट जैसे अति-संवेदनशील और प्रमुख प्रशासनिक केंद्र में प्रवेश के लिए जहां सुगम व्यवस्था होनी चाहिए, वहां वाहनों का अंबार लगा रहता है। खनिज व रजिस्ट्री विभाग में आने वाले दूर-दराज के ग्रामीणों को घंटों कड़कती धूप में गाड़ियां पार्क करने के लिए भटकना पड़ता है। जर्जर भवन की मरम्मत के नाम पर बैरिकेडिंग कर अपनी जिम्मेदारियों से इतिश्री कर लेने वाले अधिकारियों की कार्यशैली पर अब आम जनता सवाल उठा रही है। यदि देश व प्रदेश की सरकारें सुशासन और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के बड़े-बड़े दावे करती हैं, तो जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक कलेक्ट्रेट परिसर में एक अदद स्थाई और व्यवस्थित पार्किंग का न होना सीधे तौर पर व्यवस्था की पोल खोलता है।

कलेक्ट्रेट परिसर में रोजाना पैदा हो रही इस अराजकता के लिए सीधे तौर पर जिला प्रशासन, स्थानीय निकाय और यातायात विभाग के जिम्मेदार अधिकारी जवाबदेह हैं। जर्जर हिस्से की तत्काल मरम्मत कराने, परिसर में स्थाई पार्किंग स्थल चिन्हित करने और वाहनों की आवजाही को सुव्यवस्थित करने के लिए अब तक कोई ठोस नीति क्यों नहीं बनाई गई? आम नागरिक जब सड़कों पर गाड़ियां खड़ी करते हैं तो यातायात पुलिस तत्काल चालान काटने पहुंच जाती है, लेकिन कलेक्ट्रेट परिसर के भीतर पसरी इस बेतरतीबी पर कोई कार्रवाई या प्रबंधन देखने को नहीं मिलता। स्थिति यह हो गई है कि पैदल चलने वालों तक के लिए रास्ता नहीं बचता। यदि समय रहते जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी सुस्ती छोड़कर कलेक्ट्रेट परिसर में व्यवस्थित पार्किंग और जर्जर भवन के संधारण का कार्य शुरू नहीं कराया, तो आने वाले दिनों में यह प्रशासनिक लापरवाही किसी बड़े हादसे या जन-आक्रोश का कारण बन सकती है।

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