कलेक्टर साहब देखिये आपकी नाक के नीचे चल रहा है नजराना का खेल?

दलालों के उंगलियों के इशारों पर नाच रहा है जिला अस्पताल? 




Junaid khan - शहडोल। मध्य प्रदेश के शहडोल संभाग का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल आज अपनी चिकित्सा के लिए नहीं, बल्कि अपने 'सिस्टम' की सड़न के लिए चर्चा में है। कहने को तो यह 'जिला अस्पताल' है, जहाँ संभाग के सुदूर वनांचलों से गरीब आदिवासी और मजदूर इस उम्मीद में आते हैं कि उन्हें सरकार की ओर से मुफ्त इलाज मिलेगा। लेकिन अस्पताल की दहलीज पार करते ही उनकी उम्मीदों का गला घोंट दिया जाता है। यहाँ का वातावरण दवाओं की खुशबू से नहीं, बल्कि दलालों की साजिशों और रिश्वत की बदबू से भरा हुआ है। शहडोल जिला अस्पताल आज एक स्वास्थ्य केंद्र नहीं, बल्कि 'वसूली केंद्र' बन चुका है।

सर्जरी' या 'सौदागरी'? 

ऑपरेशन टेबल तक का रास्ता रिश्वत से होकर जाता है।अस्पताल के सर्जिकल वार्ड में जो खेल चल रहा है, वह किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कंपा देने के लिए काफी है। यहाँ 'आयुष्मान कार्ड' और 'मुफ्त इलाज' के सरकारी वादे केवल दीवारों पर चिपके पोस्टरों तक सीमित हैं। वास्तविकता यह है कि यहाँ ऑपरेशन की तारीख डॉक्टर की फुर्सत नहीं, बल्कि मरीज के परिजनों द्वारा दिये गये नजराना तय करता है।

रिश्वत' तय करती है? 

जब कोई गरीब मरीज ऑपरेशन के लिए आता है, तो डॉक्टर और उनके गुर्गे (दलाल) सक्रिय हो जाते हैं। सीधे तौर पर हजारों रुपयों की मांग की जाती है। यदि परिजन पैसा देने में असमर्थता जताते हैं, तो शुरू होता है 'तारीख का खेल'। जो ऑपरेशन आज होना चाहिए, उसे "अगले महीने आना" कहकर टाल दिया जाता है। यह विलंब केवल समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि मरीज की बीमारी को जानलेवा बनाने की एक सोची-समझी साजिश है।

मशीन खराब है'?

भ्रष्टाचार का सबसे पुराना और घिनौना बहाना शहडोल जिला अस्पताल में अक्सर एक वाक्य गूंजता है मशीन खराब है।" यह वाक्य सुनते ही मरीज के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। लेकिन क्या सच में मशीनें खराब होती हैं अस्पताल के भीतर का 'ओपन सीक्रेट' यह है कि मशीनें केवल उन लोगों के लिए खराब होती हैं जो रिश्वत या नजराना नहीं दे सकते। जैसे ही कोई दलाल किसी 'सेटिंग' वाले मरीज को लाता है, वही मशीन जादुई तरीके से ठीक हो जाती है। "मशीन खराब है" का डर दिखाकर मरीजों को निजी नर्सिंग होम में रेफर किया जाता है, जहाँ यही सरकारी डॉक्टर मोटी फीस लेकर वही ऑपरेशन करते हैं। यह सीधे तौर पर सरकारी संसाधनों की चोरी और निजी फायदे के लिए पद का दुरुपयोग है।

दलालों का जाल?अस्पताल का 'अघोषित समानांतर प्रशासन'? 

शहडोल जिला अस्पताल में दलालों का एक ऐसा संगठित सिंडिकेट सक्रिय है, जिसके सामने अस्पताल प्रशासन नतमस्तक नजर आता है। ये दलाल वार्डों में, ओपीडी के बाहर और यहाँ तक कि डॉक्टरों के केबिन के आसपास गिद्धों की तरह मंडराते रहते हैं।

इनका काम स्पष्ट है?

असहाय मरीजों की पहचान करना।

उन्हें सरकारी व्यवस्था का डर दिखाना।

डॉक्टरों के साथ मिलकर रिश्वत की रकम तय करना।

मरीजों को निजी एम्बुलेंस के जरिए बाहर के निजी अस्पतालों में भेज देना।

ये दलाल डॉक्टरों के 'कलेक्शन एजेंट' के रूप में काम करते हैं। जब तक इन दलालों की जेब गर्म नहीं होती, तब तक अस्पताल की फाइलें आगे नहीं बढ़तीं। क्या यह संभव है कि अस्पताल प्रबंधन और सुरक्षा गार्डों को इन चेहरों की पहचान नहीं है...! बिल्कुल नहीं। यह मिलीभगत का एक ऐसा कीचड़ है जिसमें ऊपर से नीचे तक सब सने हुए हैं।

मजबूरी का सौदा और 'केस बिगाड़ने' की धमकी? 

भ्रष्टाचार की इंतहा तब होती है जब डॉक्टर और उनके दलाल मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ देते हैं। परिजनों को डराया जाता है कि "अगर बाहर से इलाज नहीं कराया या सुविधा शुल्क नहीं दिया, तो ऑपरेशन बिगड़ सकता है।" एक डॉक्टर के मुंह से ऐसे शब्द निकलना पेशेवर कदाचार नहीं, बल्कि 'अपराधिक धमकी' है। गरीब परिजनों के पास कोई विकल्प नहीं बचता; वे अपनी जमीन गिरवी रखते हैं, अपनी औरतों के जेवर बेचते हैं और इन सफेदपोश डकैतों की तिजोरी भरते हैं। यह 'इलाज' नहीं, बल्कि 'फिरौती' है।

प्रशासन का 'मौन' और जनता का 'आक्रोश

शहडोल के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और सिविल सर्जन की चुप्पी इस पूरे मामले में सबसे बड़ी संदिग्ध है। क्या जिला कलेक्टर को इस 'लूट' की भनक नहीं है? जनसुनवाई में आने वाली शिकायतों का क्या होता है? प्रशासन का यह 'मौन' भ्रष्ट डॉक्टरों के हौसलों को और बढ़ाता है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो जनता कहाँ जाए?सरकारी रिकॉर्ड में शायद सब कुछ 'ऑल इज वेल' (सब ठीक है) दिखाया जाता होगा, लेकिन अस्पताल के फर्श पर पड़े उन मरीजों से पूछिए जिन्होंने सिर्फ इसलिए अपनों को खो दिया क्योंकि उनके पास 'सेटिंग' करने के लिए पैसे नहीं थे। यह प्रशासन की विफलता नहीं, बल्कि उसकी 'नैतिक मृत्यु' है।

समाधान और चेतावनी

अब चुप रहना अपराध है...!शहडोल की जनता को अब जागना होगा। यदि इस 'सिस्टम' को तुरंत नहीं सुधारा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब जनता का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ेगा। डॉक्टर को समाज में 'भगवान' का दर्जा दिया गया है, लेकिन शहडोल जिला अस्पताल के कुछ भ्रष्ट तत्वों ने इस पवित्र पेशे को 'कसाईखाना' बना दिया है। सफेद कोट पहनकर काली कमाई करने वाले इन चेहरों को बेनकाब करना अब हर नागरिक का कर्तव्य हो गया है। प्रशासन याद रखे कि "गरीब की आह" में वो ताकत होती है जो बड़े से बड़े सिंहासन को हिला देती है।

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