एक महीने बाद भी तंबू में जिंदगी हादसे में बेटे को खो चुकी मां अब भी मदद की आस में

एक महीने बाद भी तंबू में जिंदगी हादसे में बेटे को खो चुकी मां अब भी मदद की आस में 


Junaid khan - शहडोल। एक महीने पहले 16 जनवरी की कड़वी रात ने एक मां की दुनिया उजाड़ दी। कच्चे घर में लगी आग ने उसके इकलौते बेटे को उससे छीन लिया और जीवन भर का खालीपन दे दिया। वक्त बीतता जा रहा है, लेकिन उस रात का दर्द आज भी उसकी आंखों में साफ झलकता है। हादसे के बाद शुरुआती सहानुभूति तो मिली, पर स्थायी राहत अब तक नहीं पहुंच सकी है। पीड़िता गीता पटेल (परिवर्तित नाम) आज अपने रिश्तेदारों के यहां शरण लेकर रह रही हैं। उनका कहना है कि हादसे के बाद प्रशासन की ओर से प्रारंभिक राहत के तौर पर 10 किलो चावल, दाल, चायपत्ती, शक्कर और अंतिम संस्कार के लिए 5 हजार रुपये की सहायता दी गई थी। इसके बाद से न तो कोई अधिकारी हालचाल लेने पहुंचा और न ही किसी प्रकार की अतिरिक्त आर्थिक मदद मिल सकी। गीता बताती हैं कि उनका बेटा ही उनका एकमात्र सहारा था। अब घर भी नहीं रहा और सहारा भी छिन गया। समझ नहीं आता आगे कैसे जीवन चलेगा,” कहते-कहते उनकी आंखें भर आती हैं। जिस घर में कभी मां-बेटे की हंसी गूंजती थी, वहां अब सिर्फ जले हुए अवशेष और यादें बची हैं। परिजनों का कहना है कि उन्होंने पंचायत और राजस्व विभाग को घटना की जानकारी दी है, लेकिन अब तक न तो आवास की कोई वैकल्पिक व्यवस्था की गई है और न ही पुनर्वास को लेकर कोई ठोस कदम उठाया गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासनिक अमला शुरुआती औपचारिकता निभाकर शांत हो गया, जबकि पीड़िता आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है। गांव के लोगों का कहना है कि यदि समय रहते पक्का आवास या सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम होते, तो शायद यह हादसा टल सकता था। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक मां को अपने बेटे की यादों के सहारे ही जीवन बिताना होगा, या फिर शासन-प्रशासन उसकी मदद के लिए आगे आएगा? एक महीने बाद भी पीड़िता को स्थायी छत, आर्थिक सहायता और सामाजिक संबल की दरकार है। मानवता की कसौटी पर यह घटना प्रशासन और समाज, दोनों के लिए एक गंभीर परीक्षा बन गई है।

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