कुपोषण पर ढिलाई! शहडोल के एनआरसी केंद्रों में आधे से ज्यादा बेड खाली,लक्ष्य से पीछे प्रशासन
Junaid khan - शहडोल। जिले में कुपोषण के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की जमीनी हकीकत चिंताजनक नजर आ रही है। कमिश्नर और कलेक्टर की लगातार समीक्षा बैठकों व सख्त निर्देशों के बावजूद पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) बच्चों की भर्ती के मामले में लक्ष्य से काफी पीछे चल रहे हैं। जिला चिकित्सालय शहडोल स्थित 20 बिस्तरों वाले एनआरसी वार्ड में इस माह पखवाड़ा समाप्त होने को है, लेकिन अभी तक केवल 7 बच्चों को ही भर्ती किया गया है, जबकि 13 बिस्तर खाली पड़े हैं। सरकार द्वारा एनआरसी केंद्रों का संचालन इस उद्देश्य से किया जाता है कि अति कुपोषित एवं गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को समय पर गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा, संतुलित आहार और सतत निगरानी उपलब्ध कराई जा सके। इसके लिए महिला एवं बाल विकास विभाग की आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं तथा स्वास्थ्य विभाग की आशा कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे चिन्हित बच्चों को प्रेरित कर एनआरसी में भर्ती कराएं। बावजूद इसके, अधिकांश महीनों में निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति नहीं हो पा रही है।
जिला अस्पताल की स्थिति सबसे कमजोर
जिला अस्पताल शहडोल का एनआरसी, जो जिले का प्रमुख केंद्र माना जाता है, वहीं सबसे कमजोर स्थिति में दिखाई दे रहा है। 20 बिस्तरों की क्षमता के मुकाबले केवल 7 बच्चों की भर्ती यह संकेत देती है कि या तो सर्वेक्षण में कमी है या फिर चिन्हित बच्चों को भर्ती कराने में लापरवाही बरती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गंभीर कुपोषित बच्चों को समय पर एनआरसी में भर्ती नहीं कराया गया, तो उनके स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। ऐसे में खाली पड़े बिस्तर प्रशासनिक उदासीनता की ओर इशारा करते हैं।
अन्य केंद्रों की स्थिति मिली-जुली
जिले के अन्य एनआरसी केंद्रों की स्थिति पर नजर डालें तो कुछ स्थानों पर बेहतर प्रयास भी दिखे हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ब्यौहारी में 10 बिस्तरों के मुकाबले 11 बच्चों को भर्ती किया गया है, जो लक्ष्य से अधिक है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जयसिंहनगर में 10 में से 8 बिस्तर भरे हुए हैं। बुढ़ार एनआरसी में 10 बिस्तरों पर 12 बच्चों का उपचार चल रहा है। सीएचसी गोहपारू में 10 में से 6 बच्चे भर्ती हैं। सिंहपुर में 10 में से 7 बिस्तरों पर बच्चे भर्ती हैं, जबकि 3 खाली हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि जिले में एक समान प्रयास नहीं हो रहे हैं। कुछ केंद्रों पर लक्ष्य से अधिक भर्ती हो रही है, तो कहीं आधे से ज्यादा बिस्तर खाली पड़े हैं।
जिम्मेदारों पर सवाल
कुपोषण जैसीहगंभीर समस्या से निपटने के लिए सरकार द्वारा पर्याप्त संसाधन और व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है। बावजूद इसके यदि लक्ष्य पूरे नहीं हो रहे, तो सवाल विभागीय समन्वय और मैदानी अमले की सक्रियता पर उठना स्वाभाविक है। जानकारों का कहना है कि आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं द्वारा नियमित सर्वे, घर-घर संपर्क और अभिभावकों की काउंसलिंग को और प्रभावी बनाने की जरूरत है। कई बार अभिभावक सामाजिक कारणों या जानकारी के अभाव में बच्चों को भर्ती कराने से कतराते हैं, ऐसे में जागरूकता अभियान भी तेज करने होंगे। कुपोषण मुक्त जिला बनाने का लक्ष्य अधूरा प्रदेश सरकार द्वारा कुपोषण मुक्त जिला बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, लेकिन एनआरसी केंद्रों की मौजूदा स्थिति इस दिशा में गंभीर चुनौतियों को दर्शाती है। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो कुपोषण उन्मूलन के प्रयास कागजी साबित हो सकते हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन आगामी समीक्षा बैठक में इन आंकड़ों पर क्या कदम उठाता है और खाली पड़े बिस्तरों को भरने के लिए क्या ठोस रणनीति बनाई जाती है।
