स्टेडियम भूमि विवाद पर हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी, बिना अधिग्रहण व मुआवजा दिए कब्जे का आरोप
Junaid Khan - शहडोल। शहडोल जिले के गांधी स्टेडियम की जमीन को लेकर चल रहे विवाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जबलपुर ने सुनवाई के दौरान बेहद सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा यह स्टेडियम तो आपका है, आप इसके मालिक हो, इसके अंदर किसी को मत आने दो, जो आए उससे हर माह फीस वसूल करो। इतना ही नहीं कलेक्टर साहब को भी स्टेडियम के अंदर नहीं आने देना। यह टिप्पणी उस समय की गई जब स्टेडियम भूमि विवाद की सुनवाई के दौरान कलेक्टर डॉ. केदार सिंह एवं मुख्य नगर पालिका अधिकारी आशा भंडारी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुईं। वहीं वादियों की ओर से अधिवक्ता गिरीश श्रीवास्तव ने पैरवी की। मामला स्टेडियम की निजी स्वामित्व वाली 4 एकड़ भूमि का बिना अधिग्रहण जिला प्रशासन एवं नगरपालिका द्वारा कब्जा किए जाने से जुड़ा हुआ है।
लाइव वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल न्यायाधीश की टिप्पणी चर्चा में
जबलपुर हाईकोर्ट में हुई सुनवाई का लाइव वीडियो अब इंटरनेट मीडिया में तेजी से प्रसारित हो रहा है। वीडियो में न्यायाधीश द्वारा कलेक्टर एवं मुख्य नगरपालिका अधिकारी को आड़े हाथ लेते हुए कहा गया कि बेशकीमती जमीन का जिला प्रशासन द्वारा उचित मुआवजा नहीं दिया जा रहा है और न ही जमीन का अधिग्रहण करने कोई वैधानिक प्रक्रिया अपनाई गई है।”
17 एकड़ से अधिक भूमि का मामला, 4 एकड़ पर विवाद भूमिस्वामी पक्ष के मोहम्मद खालिक ने बताया कि स्टेडियम एवं उसके आसपास करीब 17 एकड़ से अधिक भूमि उनके नाना स्व. इनायत खान पुत्र स्व. लाला खान के पट्टे की आराजी थी। इसमें से 4 एकड़ को छोड़कर शेष भूमि का वर्षों पहले जिला प्रशासन द्वारा अधिग्रहण कर मुआवजा प्रदान किया गया था। लेकिन शेष 4 एकड़ जमीन निजी स्वामित्व में बची हुई थी, जिस पर 1975 के आसपास जिला प्रशासन द्वारा कब्जा कर उसमें स्टेडियम बना दिया गया। इस भूमि का न तो अधिग्रहण किया गया और न ही कोई उचित मुआवजा दिया गया।
सिविल कोर्ट से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
इस मामले को लेकर पहले शहडोल में सिविल सूट दायर किया गया, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने कुल 4 एकड़ में से 2 एकड़ भूमि भूमिस्वामी एवं 2 एकड़ स्टेडियम के पक्ष में होने का निर्णय पारित किया था। इस फैसले के खिलाफ एडीजे कोर्ट शहडोल में अपील की गई, जहां सुनवाई के बाद निचली अदालत का फैसला पलटते हुए पूरी 4 एकड़ जमीन भूमिस्वामी के नाम करने का निर्णय सुनाया गया। इसके बावजूद लंबी कानूनी लड़ाई के बाद भी भूमिस्वामी को न तो जमीन मिल पाई और न ही मुआवजा प्रदान किया गया। वहीं निचली अदालत के फैसले के विरुद्ध जिला प्रशासन द्वारा दो बार हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक अपील की गई।
प्रशासन की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
हाईकोर्ट की टिप्पणी ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए और उचित मुआवजा दिए बेशकीमती जमीन पर कब्जा किए जाने के आरोपों ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है। अब इस प्रकरण में अगली सुनवाई और कोर्ट के अंतिम निर्णय पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं, जो न केवल भूमिस्वामी बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होगा।

