बसों पर ब्रेक,छात्रों के भविष्य पर भी रोक

नबलपुर कैंपस जाने से रोके गए छात्र,भड़का आक्रोश छात्र नेता सुहैल आलम ने उठाए प्रशासन पर गंभीर सवाल


Junaid Khan - शहडोल। विश्वविद्यालय और प्रशासन की लापरवाही एक बार फिर सड़कों पर खुलकर सामने आ गई, जब आज छात्रों को नबलपुर कैंपस जाने से रोक दिया गया। बसों के संचालन पर अचानक लगाई गई रोक ने न केवल छात्रों की पढ़ाई बाधित की, बल्कि उनके भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने छात्र समुदाय में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। छात्र नेता सुहैल आलम ने इस मुद्दे को लेकर प्रशासन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यह केवल एक दिन की समस्या नहीं है, बल्कि लगातार हो रही अनदेखी और गलत फैसलों का परिणाम है, जिसका खामियाजा सीधे छात्रों को भुगतना पड़ रहा है।

बसें बंद,पढ़ाई ठप आखिर जिम्मेदार कौन? 

सुबह जब छात्र नियमित रूप से नबलपुर कैंपस जाने के लिए बस स्टैंड पहुंचे, तो उन्हें यह कहकर रोक दिया गया कि बसें नहीं चलेंगी। अचानक लिए गए इस फैसले ने सैकड़ों छात्रों को बीच रास्ते में ही रोक दिया। कई छात्र परीक्षा और महत्वपूर्ण कक्षाओं से वंचित रह गए। छात्रों का कहना है कि बिना किसी पूर्व सूचना के इस तरह का कदम उठाना उनकी पढ़ाई के साथ सीधा खिलवाड़ है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार का खुला उल्लंघन है। 

यह सिर्फ परिवहन नहीं,भविष्य का सवाल है। सुहैल आलम

छात्र नेता सुहैल आलम ने कहा,बसों पर रोक लगाकर प्रशासन ने छात्रों की राह ही नहीं, उनका भविष्य भी रोक दिया है। क्या छात्रों का समय सिर्फ नारों और आंदोलनों में ही बीतेगा? या फिर जिम्मेदार अधिकारी अपनी जवाबदेही समझेंगे?” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया, तो आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है। लगातार बढ़ रही समस्याएं, लेकिन समाधान नदारद

यह पहला मामला नहीं है जब छात्रों को इस तरह की परेशानी का सामना करना पड़ा हो। परिवहन, संसाधनों की कमी, और प्रशासनिक उदासीनता जैसे मुद्दे लंबे समय से छात्रों को परेशान कर रहे हैं। लेकिन हर बार आश्वासन के अलावा कुछ भी ठोस नहीं हुआ। छात्रों का आरोप है कि प्रशासन केवल कागजी योजनाओं तक सीमित है, जमीनी हकीकत से उसका कोई लेना-देना नहीं है। सड़क पर उतरने को मजबूर छात्र

आज की घटना के बाद छात्रों ने विरोध प्रदर्शन भी किया और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। उनका कहना है कि अगर इसी तरह उनकी समस्याओं को नजरअंदाज किया गया, तो वे उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।

प्रशासन की चुप्पी ने बढ़ाए सवाल 

इस पूरे मामले पर प्रशासन की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। यही चुप्पी अब सबसे बड़ा सवाल बनती जा रही है आखिर छात्रों के भविष्य के साथ हो रहे इस खिलवाड़ का जिम्मेदार कौन है? अब वक्त है जवाबदेही का। यह मुद्दा केवल बसों का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों का प्रतीक बन चुका है। अगर समय रहते प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह आक्रोश आने वाले दिनों में बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। अब सवाल सीधा है। क्या छात्रों का भविष्य यूं ही सड़कों पर भटकता रहेगा, या जिम्मेदार अधिकारी जागेंगे?

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