हाईवा से ट्रॉली तक ‘रेत का खेल’, एक ही माल के 5-6 सौदे…शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं,जनता में उबाल
Junaid Khan - शहडोल। जिले में रेत कारोबार से जुड़ा एक बड़ा और चौंकाने वाला घोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घेरोला मोहल्ला निवासी समाजसेवी अशरफ खान द्वारा कलेक्टर को दिए गए ज्ञापन में रेत व्यापारियों द्वारा आम जनता के साथ की जा रही सुनियोजित ठगी का खुलासा किया गया है। बावजूद इसके, अब तक न तो कोई जांच बैठाई गई है और न ही किसी प्रकार की कार्रवाई की गई है, जिससे लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
मामले में आरोप है कि जिले में चल रही रेत की गाड़ियों और डंपरों में से करीब 70 प्रतिशत वाहन उपभोक्ताओं को धोखा दे रहे हैं। ग्राहकों को 180 से 200 घनफीट रेत का दावा कर माल दिया जाता है, जबकि हकीकत में मात्र 130 घनफीट के आसपास ही रेत निकलती है। इस तरह खुलेआम लोगों की जेब पर डाका डाला जा रहा है। इस पूरे खेल का सबसे खतरनाक पहलू गाड़ियों में की जा रही तकनीकी हेराफेरी है। डंपरों और ट्रॉलियों की बॉडी के अंदर एंगल और लोहे की चादरें फिट कर दी जाती हैं, जिससे गाड़ी की वास्तविक क्षमता 8 से 10 इंच तक कम हो जाती है। बाहर से गाड़ी पूरी भरी हुई नजर आती है, लेकिन अंदर से रेत की मात्रा कम होती है। यही धोखाधड़ी का मुख्य तरीका बन चुका है। जब ग्राहक गाड़ी खाली कराकर वास्तविक माप लेते हैं, तब जाकर इस घोटाले की सच्चाई सामने आती है। लेकिन अधिकतर लोग जानकारी के अभाव में ऐसा नहीं कर पाते और ठगी का शिकार हो जाते हैं। खासकर ग्रामीण और गरीब वर्ग के लोग इस खेल में सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। शिकायत में यह भी उजागर किया गया है कि रेत माफिया हाईवा से एक बार में रेत गिरवाकर उसी माल को ट्रॉलियों के माध्यम से 5 से 6 बार बेच रहे हैं। यानी एक ही रेत से कई गुना मुनाफा कमाया जा रहा है। इस तरीके से व्यापारियों द्वारा करोड़ों का अवैध लाभ कमाने की आशंका जताई जा रही है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिले में रेत का विधिवत ठेका न होने के बावजूद दिन-रात रेत से भरे वाहन सड़कों पर खुलेआम दौड़ रहे हैं। कलेक्टर कार्यालय, एसपी कार्यालय और अधिकारियों के बंगलों के सामने से लगातार रेत की गाड़ियां गुजर रही हैं, फिर भी जिम्मेदार विभाग आंख मूंदे बैठे हैं। कीमतों में भी भारी अनियमितता देखने को मिल रही है। जहां एक ट्रिप रेत की वास्तविक कीमत करीब 5000 रुपये होनी चाहिए, वहीं लोगों से 8000 से लेकर 15000-20000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। यानी कम माल देकर ज्यादा पैसा लेने का दोहरा खेल धड़ल्ले से चल रहा है। समाजसेवी अशरफ खान ने कलेक्टर से मांग की है कि जिले में चल रही सभी रेत गाड़ियों, विशेषकर 912 मॉडल डंपरों की जांच कराई जाए और दोषी व्यापारियों पर सख्त कार्रवाई हो। साथ ही नाप-तौल विभाग और खनिज विभाग को संयुक्त रूप से अभियान चलाकर इस गोरखधंधे पर रोक लगाने की आवश्यकता बताई गई है। इस पूरे मामले की सूचना संबंधित विभागों को भी दी जा चुकी है, लेकिन अब तक किसी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर प्रशासन की चुप्पी के पीछे क्या वजह है और कब तक आम जनता इस लूट का शिकार होती रहेगी। जनता में इस मुद्दे को लेकर भारी आक्रोश व्याप्त है। लोग अब प्रशासन से जवाब और कार्रवाई दोनों चाहते हैं। यदि जल्द ही सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन को तत्काल विशेष जांच दल गठित कर पूरे रेत कारोबार की जांच करनी चाहिए, गाड़ियों की क्षमता का सत्यापन कराया जाना चाहिए और हर वाहन पर माप संबंधी जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करवाई जानी चाहिए। अब सबसे बड़ा सवाल यही है। क्या प्रशासन इस गंभीर शिकायत को संज्ञान में लेकर कार्रवाई करेगा या फिर रेत माफियाओं का यह खेल यूं ही चलता रहेगा? शहडोल की जनता को अब सिर्फ कार्रवाई का इंतजार है, और हर नजर प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हुई है।
