मजदूर की मौत के बाद प्रबंधन ने झाड़ा पल्ला,दो अधिकारी निलंबित

सुरक्षा मानकों की अनदेखी बनी जानलेवा,पोल से गिरकर श्रमिक की दर्दनाक मौत 24 घंटे बाद पुलिस को सूचना देने पर उठे गंभीर सवाल


Junaid Khan - शहडोल। कोयलांचल के सोहागपुर क्षेत्र अंतर्गत बंधवागढ़ कॉलोनी खदान में एक दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर श्रमिक सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है। यहां मेंटेनेंस कार्य के दौरान ऊंचाई से गिरकर एक ठेका मजदूर की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि सुरक्षा मानकों को ताक पर रखकर काम कराया जा रहा था, जिसका खामियाजा एक श्रमिक को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा। इस हृदयविदारक घटना के बाद प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए एक यांत्रिक अभियंता और एक विद्युत पर्यवेक्षक को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन सवाल अब भी कायम है कि क्या केवल निलंबन से पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाएगा? 

सुरक्षा उपकरणों का अकाल, लापरवाही बनी मौत की वजह 

प्राप्त जानकारी के अनुसार, लगभग 43 वर्षीय ठेका मजदूर बिजली के खंभे पर सुधार कार्य के लिए चढ़ा था। बिना किसी पुख्ता सुरक्षा इंतजाम और जरूरी उपकरणों के अभाव में वह संतुलन खो बैठा और सीधे जमीन पर गिर गया। गिरने से उसके सिर और शरीर के कई हिस्सों में गंभीर चोटें आईं, जो अंततः उसकी मौत का कारण बनीं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मौके पर प्राथमिक उपचार की भी कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी। घायल मजदूर को जल्द अस्पताल पहुंचाने में भी देरी हुई, जिससे उसकी हालत और बिगड़ गई।

गांव में पसरा मातम, परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल

घटना की खबर मिलते ही मजदूर के घर और गांव में मातम पसर गया। परिजन और ग्रामीण बड़ी संख्या में मौके पर पहुंचे और प्रबंधन के खिलाफ आक्रोश जताया। महिलाओं और बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल था। लोगों ने आरोप लगाया कि खदान प्रबंधन हमेशा से ही मजदूरों की सुरक्षा को लेकर लापरवाह रहा है।

गाज तो गिरी, पर नीयत में खोट कार्रवाई पर उठे सवाल 

बिलासपुर मुख्यालय के निर्देश पर यांत्रिक अभियंता विकास सिंह और उप क्षेत्रीय प्रबंधक द्वारा विद्युत पर्यवेक्षक जग कुमार वर्मा को निलंबित कर दिया गया। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कार्रवाई केवल दिखावा है। लोगों का आरोप है कि बड़े अधिकारी वातानुकूलित कमरों में बैठकर सुरक्षा बजट को नजर अंदाज करते हैं और हादसे के बाद छोटे कर्मचारियों पर गाज गिरा दी जाती है।

पुलिस को सूचना देने में 24 घंटे की देरी,संदेह गहराया 

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि प्रबंधन ने घटना की सूचना पुलिस को देने में लगभग 24 घंटे का समय लगा दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस देरी के पीछे क्या कारण था? क्या घटना को दबाने या सबूतों से छेड़छाड़ की कोशिश की गई? पुलिस को देर से सूचना देना अपने आप में प्रबंधन की मंशा पर सवाल खड़ा करता है। कब तक सस्ते रहेंगे मजदूरों के जीवन? यह पहली घटना नहीं है जब सोहागपुर क्षेत्र में किसी मजदूर की जान गई हो। इससे पहले भी कई हादसे हो चुके हैं, लेकिन हर बार जिम्मेदारों पर ठोस कार्रवाई के बजाय औपचारिकता निभाई जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन नहीं होगा और लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं होंगे, तब तक ऐसे हादसों पर अंकुश लगाना मुश्किल है।

प्रशासन और प्रबंधन दोनों कठघरे में इस घटना ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि खदान क्षेत्रों में काम कर रहे हजारों मजदूरों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। प्रशासनिक निगरानी की कमी और प्रबंधन की लापरवाही मिलकर श्रमिकों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रही है। जरूरत है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो और मृतक के परिवार को उचित मुआवजा व न्याय दिलाया जाए। यह हादसा सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का आईना है।

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