शादी के महज़ 20 दिन बाद नवविवाहिता की संदिग्ध मौत

झाड़-फूंक' और अंधविश्वास के चक्रव्यूह में घुट कर दम तोड़ती बेटियां, कब जागेगा ब्यौहारी प्रशासन?


Junaid Khan - शहडोल। जिला मुख्यालय से दूर ग्रामीण अंचलों में फैली प्रशासनिक शिथिलता और अंधविश्वास की जड़ें आज भी कितनी गहरी हैं, इसका एक और रोंगटे खड़े कर देने वाला खूनी उदाहरण ब्यौहारी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम भोगिया में देखने को मिला है। यहां एक 28 वर्षीय नवविवाहिता गीतांजलि पटेल, पिता सुधीर पटेल (निवासी वार्ड क्रमांक 04, भोगिया) ने शादी के महज 20 दिन बाद अपने मायके में फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। मृतका का विवाह बीते 20 अप्रैल को नजदीकी ग्राम आमडीह में बड़े ही धूमधाम और अरमानों के साथ संपन्न हुआ था। अभी हाथों की रची मेहंदी का रंग भी नहीं छूटा था,शहनाइयों की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि शादी की खुशियां अचानक गहरे मातम में तब्दील हो गईं। चार दिन पहले ही मायके आई गीतांजलि ने ऐसा आत्मघाती कदम क्यों उठाया, यह न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि हमारे सामाजिक, स्वास्थ्य और प्रशासनिक ढांचे को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा करता है। घटनाक्रम के अनुसार, बुधवार सुबह जब गीतांजलि के माता-पिता हर रोज की तरह अपनी आजीविका के लिए तेंदूपत्ता तोड़ने जंगल गए हुए थे, तभी सूने घर का फायदा उठाकर गीतांजलि ने अपने कमरे में फांसी का फंदा तैयार किया और उस पर झूल गई। कुछ देर बाद जब उसकी भाभी कमरे की तरफ पहुंची, तो अंदर का खौफनाक मंजर देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। गीतांजलि का शव फंदे से लटक रहा था। चीख-पुकार मचने पर आस-पास के ग्रामीण और परिजन मौके पर एकत्र हुए और ब्यौहारी पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शव को अपने कब्जे में लिया और मर्ग कायम कर आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। जांच मामले की कमान संभाल रहे उप निरीक्षक राजकुमार ठाकुर ने बताया कि परिजनों के प्रारंभिक बयानों के अनुसार मृतका शादी के पहले से ही बीमार रहती थी, जिसे वे आत्महत्या का मुख्य कारण मान रहे हैं। परिजनों ने फिलहाल ससुराल पक्ष पर किसी प्रकार का आरोप नहीं लगाया है, लेकिन कानूनन और नैतिक रूप से यह कहानी इतनी सीधी नहीं है जितनी सतही तौर पर दिखाई जा रही है। इस पूरे मामले का सबसे स्याह और संवेदनशील पहलू जो सामने आया है, वह स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और पुलिस के खुफिया तंत्र की घोर विफलता को उजागर करता है। परिजनों के मुताबिक, गीतांजलि लंबे समय से अस्वस्थ थी, लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और योग्य डॉक्टरों पर भरोसा करने के बजाय उसका इलाज ग्रामीण अंचलों में सक्रिय 'झाड़-फूंक' करने वाले ओझाओं और तांत्रिकों के माध्यम से कराया जा रहा था। अंधविश्वास का यह अवैध धंधा ब्यौहारी के कई गांवों में धड़ल्ले से फल-फूल रहा है, जहां सीधे-साधे ग्रामीणों को गुमराह कर मोटी रकम वसूली जाती है और अंततः मरीज मानसिक और शारीरिक रूप से इस कदर टूट जाता है कि मौत को गले लगा लेता है। गीतांजलि की बीमारी क्या थी? क्या वह किसी गंभीर मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार थी या फिर शादी के बाद उस पर कोई सामाजिक-पारिवारिक दबाव था? इन बुनियादी सवालों की तह तक जाने के बजाय पुलिस अक्सर मर्ग कायम कर फाइल को ठंडे बस्ते में डाल देती है, जिससे इन अवैध काम करने वाले तांत्रिकों और अंधविश्वास के सौदागरों के हौसले और बुलंद हो जाते हैं।

प्रशासन और पुलिस के सामने 'jk न्यूज' के सीधे सवाल: 

1.अवैध तांत्रिक अड्डों पर कार्रवाई कब?: ब्यौहारी और आस-पास के क्षेत्रों में बीमारी के नाम पर झाड़-फूंक करने वाले और अंधविश्वास फैलाने वाले तत्वों के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय पुलिस संयुक्त अभियान चलाकर महामारी अधिनियम और जादू-टोना विरोधी कानूनों के तहत कार्रवाई क्यों नहीं करती? इन ढोंगियों को किसका संरक्षण प्राप्त है?

2.ससुराल और मायके दोनों पक्षों की सघन जांच हो: शादी के महज 20 दिन के भीतर एक युवती का इस तरह आत्मघाती कदम उठाना गंभीर संशय पैदा करता है। केवल 'पुरानी बीमारी' का बहाना बनाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश तो नहीं हो रही? क्या नवविवाहिता पर किसी प्रकार का मानसिक या पारिवारिक दबाव था? इसकी निष्पक्ष और सूक्ष्म जांच जरूरी है।

3.ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य जागरूकता का अभाव: स्थानीय स्तर पर तैनात एएनएम, आशा कार्यकर्ता और सामुदायिक स्वास्थ्य अमला क्या सिर्फ कागजों पर काम कर रहा है? यदि कोई बेटी लंबे समय से बीमार थी और उसका इलाज झाड़-फूंक से हो रहा था, तो इसकी जानकारी सरकारी तंत्र को क्यों नहीं थी? ग्रामीण अंचलों में अंधविश्वास के खिलाफ जमीनी जागरूकता अभियान चलाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

नोट: इस पूरी रिपोर्ट को एक कड़े संपादकीय लहजे में ढाला गया है ताकि स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस मुद्दे पर जवाबदेह बने और क्षेत्र में चल रहे झाड़-फूंक के अवैध धंधों पर नकेल कसी जा सके।

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