वादों के मलबे में दबा 'वार्ड 29' का विकास,500 मीटर नाली के लिए तरस रहे रहवासी, मानसून सिर पर पर PWD कुंभकर्णी नींद में

सड़क नापने पहुंचे अफसरों का जनता ने किया घेराव,नगर पालिका और लोक निर्माण विभाग के 'लेटर-वॉर' में फंसी जनता की जिंदगी, इस बार फिर डूबने की कगार पर बस्ती 


Junaid Khan - शहडोल। प्रशासनिक अदूरदर्शिता,आपसी तालमेल की कमी और कछुआ गति कार्यप्रणाली का इससे बड़ा जीवंत उदाहरण और क्या होगा कि जिला मुख्यालय के वार्ड क्रमांक 29 के रहवासी पिछले एक वर्ष से महज 500 मीटर की नाली निर्माण के लिए दफ्तर-दर-दफ्तर चक्कर काटने को मजबूर हैं। स्थानीय एफसीआई (FCI) गोदाम से लेकर गोरतरा स्कूल तक चमचमाती सड़क का निर्माण तो लोक निर्माण विभाग (PWD) ने बड़े तामझाम के साथ कर दिया, लेकिन इसके समानांतर बनने वाली नाली को कागजी फाइलों के भारी-भरकम बोझ तले दबाकर छोड़ दिया गया। नतीजा यह है कि बिना नाली की इस सड़क के कारण पूरी रिहायशी बस्ती टापू में तब्दील होने की कगार पर आ खड़ी हुई है। पिछले साल हुए भारी जलभराव का दंश झेल चुके नागरिकों का आक्रोश अब सातवें आसमान पर है, क्योंकि आगामी मानसून सिर पर दस्तक दे रहा है और जिम्मेदार अधिकारी वादों की मलाई चाटने में व्यस्त हैं।

अफसरों की घेराबंदी और तीखे सवाल 

बीते गुरुवार को जब विभाग के बेपरवाह अधिकारी अमले के साथ क्षेत्र में महज 'सड़क की नाप-जोख' की रस्म अदायगी करने पहुंचे, तो स्थानीय पीड़ित रहवासियों और जागरूक जनप्रतिनिधियों के सब्र का बांध टूट गया। जनता ने मौके पर ही अधिकारियों के वाहनों को रोककर उनकी घेराबंदी की और व्यवस्था के मुंह पर सीधे तीखे सवाल दागे। भारी भीड़ के बीच अधिकारियों के पास जनता के इन वाज़िब सवालों का कोई तार्किक जवाब नहीं था। स्थानीय पार्षद शक्ति लक्षकार ने इस प्रशासनिक विफलता की कलई खोलते हुए साफ किया कि उन्होंने विभाग के आला अधिकारियों को एक व्यावहारिक विकल्प भी दिया था यदि PWD को नाली बनाने में तकनीकी दिक्कत है, तो वह शेष सड़क का निर्माण पूरा कर दे और नाली निर्माण का कार्य नगर पालिका को सौंप दिया जाए। शुरुआती सहमति जताने के बाद, अब लोक निर्माण विभाग 'लंबी विभागीय प्रक्रिया' और लालफीताशाही का रोना रोकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहा है।

प्रशासन को सीधी चुनौती: सुधरो,वरना जनता सिखाएगी सबक 

यह पूरा मामला सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन की नीयत और कार्यक्षमता को खुली चुनौती देता है। एक तरफ सरकार बुनियादी ढांचे के विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर आधी-अधूरी सड़कों और गायब नालियों के कारण पूरी की पूरी बस्ती नरकीय जीवन जीने को विवश है। विभागीय अधिकारियों की यह घोर लापरवाही किसी बड़े हादसे या महामारी को खुला आमंत्रण दे रही है। कागजों पर विकास की लकीरें पीटने वाले अफसर यह भूल रहे हैं कि जनता के टैक्स के पैसे से मिलने वाली तनख्वाह एसी कमरों में बैठकर फाइलों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि जनसमस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए मिलती है। यदि मानसून की पहली बारिश से पहले इस 500 मीटर की नाली का निर्माण युद्धस्तर पर शुरू नहीं हुआ, तो यह आक्रोशित जनता न केवल सड़कों पर उतरने को बाध्य होगी, बल्कि इस प्रशासनिक निकम्मेपन के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा करने से भी पीछे नहीं हटेगी।

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