मानव तस्करी' की बड़ी साजिश नाकाम,डिंडोरी की 9 नाबालिग बच्चियों को रात के अंधेरे में फर्जी सेल्स कंपनी ने बुलाया

अधिवक्ता सुनील सिंह मोनू,की सूझबूझ से बचीं मासूम जिंदगियां

प्रशासनिक तंत्र फेल! रात 9 से 10 के बीच बस से उतारी गईं 16-17 साल की लड़कियां,न रहने का ठिकाना, न खाने की व्यवस्था; आखिर इन फर्जी कंपनियों पर कब कसेगा शिकंजा? 


Junaid Khan - शहडोल। जिले में रोजगार के नाम पर मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले एक बहुत बड़े नेटवर्क का सनसनीखेज खुलासा हुआ है। डिंडोरी जिले के सुदूर ग्रामीण अंचलों से बहला-फुसलाकर लाई गईं 9 नाबालिग बच्चियों को रात के अंधेरे में शहडोल के बस स्टैंड पर लावारिस छोड़ दिया गया। जिनकी उम्र महज 16 से 17 साल के बीच है, उन्हें रात 9 से 10 बजे के बीच किसी तथाकथित फर्जी सेल्स कंपनी की 'सीक्रेट मीटिंग' के नाम पर यहां बुलाया गया था। चौंकाने वाली बात यह है कि इन बच्चियों के पास न तो रहने का कोई ठिकाना था और न ही खाने की कोई व्यवस्था। घने अंधेरे और असुरक्षित माहौल में इन मासूमों के साथ कोई भी बेहद गंभीर और अप्रिय घटना घटित हो सकती थी, लेकिन स्थानीय प्रशासनिक खुफिया तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगी। इस पूरे घटनाक्रम ने महिला सुरक्षा और कानून व्यवस्था को लेकर शासन-प्रशासन की मुस्तैदी पर कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।

फरिश्ता बनकर आए अधिवक्ता सुनील सिंह (मोनू), डायल 112 की सूचना पर जागी पुलिस 

इस खौफनाक साजिश का पर्दाफाश तब हुआ जब रात के वक्त संदिग्ध हालत में खड़ी इन बच्चियों पर स्थानीय सजग अधिवक्ता सुनील सिंह (मोनू) की नजर पड़ी। उन्होंने संवेदनशीलता दिखाते हुए जब बच्चियों से पूछताछ की, तो परत-दर-परत सच सामने आने लगा। बच्चियों ने सहमे हुए लहजे में बताया कि वे डिंडोरी जिले के अलग-अलग गांवों से इस बस में बैठकर यहां पहुंची हैं और उन्हें नौकरी व मीटिंग का झांसा दिया गया था। मामले की गंभीरता और किसी बड़ी अनहोनी की आशंका को भांपते हुए अधिवक्ता सुनील सिंह ने बिना वक्त गंवाए तत्काल पुलिस हेल्पलाइन 'डायल 112' पर इसकी सूचना दी। सूचना मिलते ही पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सभी बच्चियों को अपनी कस्टडी में लिया और उनके रहने व खाने-पीने की सुरक्षित व्यवस्था सुनिश्चित की।

(जेके न्यूज) की खबर का बड़ा असर,सुबह सकुशल घर रवानगी, परिजनों को दी गई समझाइश

अखबार द्वारा इस संवेदनशील मुद्दे को प्रमुखता से उठाए जाने और सजग नागरिकों के दखल के बाद पुलिस प्रशासन बैकफुट पर आया और मामले में तत्परता दिखाई गई। पुलिस प्रशासन द्वारा सभी बच्चियों के परिजनों से देर रात ही संपर्क साधा गया। अधिकारियों ने बच्चियों के माता-पिता से बात कर उन्हें सख्त हिदायत और समझाइश दी कि "बच्चों को पढ़ाएं-लिखाएं, उन्हें आत्मनिर्भर बनाएं और ऐसे फर्जी व ठग प्रवृत्ति के लोगों के झांसे में आने से बचाएं।" पुलिस की इस मुस्तैदी के बाद सभी बच्चियां सुबह सकुशल अपने घर के लिए रवाना हो गईं। हालांकि बच्चियां सुरक्षित घर पहुंच रही हैं, लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि ग्रामीण इलाकों में सक्रिय यह फर्जी गिरोह सीधे-साधे परिवारों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें जाल में फंसा रहा है।

सवालों के घेरे में खाकी और प्रशासनिक अमला,कब तक मूकदर्शक बनी रहेगी सरकार? 

यह कोई पहला मामला नहीं है जब रोजगार के सुनहरे सपने दिखाकर नाबालिगों को इस तरह दलदल में धकेला गया हो। इस घटना ने सीधे तौर पर पुलिस के सूचना तंत्र और जिला प्रशासन को खुली चुनौती दी है। पहला सवाल: डिंडोरी से लेकर शहडोल तक की सीमाओं को पार कर एक बस में 9 नाबालिग लड़कियां रात के वक्त सफर कर रही थीं, तो परिवहन विभाग और पुलिस चेकिंग पॉइंट क्या सो रहे थे? दूसरा सवाल: शहर में फल-फूल रहीं इन फर्जी सेल्स कंपनियों का रजिस्ट्रेशन और वेरिफिकेशन क्यों नहीं किया जाता? तीसरा और सबसे बड़ा सवाल: यदि रात के वक्त अधिवक्ता सुनील सिंह सक्रियता न दिखाते, तो उन 9 मासूमों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होती? यह खबर उन सफेदपोश अपराधियों को भी सीधी चेतावनी है जो सेल्स कंपनी की आड़ में मानव तस्करी और बाल श्रम का अवैध कारोबार चला रहे हैं। प्रशासन को अब अपनी कुंभकर्णी नींद से जागना होगा और इन फर्जी कंपनियों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कर इनके आकाओं को जेल की सलाखों के पीछे भेजना होगा, वरना पत्रकारिता जगत इस आवाज को और बुलंद करेगा।

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