प्रशासन की 'फाइल' में कैद जनता की सांसें: बस स्टैंड की गिरती छत ने खोली नगर पालिका के दावों की पोल
Junaid Khan - शहडोल। सरकारी दफ्तरों की लालफीताशाही और 'फाइल-फाइल' खेलने के खेल ने आखिरकार एक और निर्दोष का लहू बहा ही दिया। जिला मुख्यालय स्थित बस स्टैंड परिसर, जो पिछले एक दशक से अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा था, वहां मंगलवार की सुबह एक बड़ी दुर्घटना हो गई। जर्जर हो चुकी छत का भारी-भरकम प्लास्टर अचानक भरभराकर गिर गया, जिसकी चपेट में आने से बस संचालन कार्य से जुड़े राजू गौतम गंभीर रूप से घायल हो गए। आनन-फानन में उन्हें जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया है, जहां उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
तीन साल से फाइलों में दफन है मरम्मत का प्रस्ताव
हैरत की बात यह है कि नगर पालिका प्रशासन को इस जर्जर भवन की सुध लेने की फुर्सत तब मिली जब एक बड़ा हादसा हो गया। सूत्रों और प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस भवन की मरम्मत और जीर्णोद्धार के लिए पिछले तीन साल से फाइलें एक टेबल से दूसरे टेबल की धूल फांक रही हैं। निरीक्षण का दौर तो कई बार चला, लेकिन बजट की 'स्वीकृति' और प्रशासनिक 'इच्छाशक्ति' के अभाव में काम आज तक शुरू नहीं हो सका। क्या प्रशासन किसी बड़ी जनहानि का इंतजार कर रहा था? मौत के साये में काम करने को मजबूर कर्मचारी और यात्री
यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी दो-तीन बार छोटे-मोटे प्लास्टर गिर चुके हैं, लेकिन जिला प्रशासन और नगर पालिका की कुंभकर्णी नींद नहीं टूटी। वर्तमान स्थिति यह है कि पूरे परिसर की छत से लोहे की छड़ें बाहर झांक रही हैं और बीमों में गहरी दरारें पड़ चुकी हैं। प्रतिदिन हजारों यात्रियों की आवाजाही वाले इस स्थान पर लोग सिर पर मौत का साया लेकर चलने को मजबूर हैं। स्थानीय बस संचालकों और दुकानदारों ने कई बार लिखित शिकायतें दीं, लेकिन अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। हादसे के बाद जागा प्रशासन, अब दिखावे की 'मरम्मत'जैसे ही हादसे की खबर फैली और आक्रोश भड़का, नगर पालिका के कर्मचारी लाव-लश्कर के साथ मौके पर पहुंचे। आनन-फानन में अन्य जगहों के लटकते प्लास्टर को तोड़ने की औपचारिकता शुरू कर दी गई। स्थानीय लोगों का स्पष्ट कहना है कि यह केवल खानापूर्ति है। कुछ हिस्सों से प्लास्टर हटा देने भर से खतरा टलने वाला नहीं है। जब तक पूरे परिसर का तकनीकी ऑडिट कर नए सिरे से निर्माण या पुख्ता मरम्मत नहीं होती, तब तक यह भवन एक 'डेथ ट्रैप' (मौत का जाल) बना रहेगा। इंजीनियर की चेतावनी को भी किया गया दरकिनार विश्वस्त सूत्रों की मानें तो नगर पालिका के इंजीनियर ने पूर्व में ही जर्जर स्थिति को देखते हुए यहाँ व्यावसायिक गतिविधियों को बंद कर तत्काल मरम्मत कराने की अनुशंसा की थी। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को इस बाबत पत्राचार भी किया था, लेकिन उन पत्रों को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया गया। विभागीय तालमेल की कमी और ठेकेदारी प्रथा के मकड़जाल ने आम आदमी की सुरक्षा को हाशिए पर धकेल दिया है।
अवैध वसूली और रखरखाव में कोताही पर उठे सवाल
बस स्टैंड परिसर से नगर पालिका को लाखों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है, लेकिन जब बात सुविधाओं और सुरक्षा की आती है, तो खजाना खाली होने का रोना रोया जाता है। स्थानीय नागरिकों ने आरोप लगाया है कि रखरखाव के नाम पर आने वाले बजट की बंदरबांट की जा रही है। जर्जर भवन की आड़ में जो भी 'अवैध' खेल चल रहे हैं, अब उन्हें बेनकाब करने का समय आ गया है। आखिर किसके संरक्षण में जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी और उनकी जान से खिलवाड़ किया जा रहा है? क्या दोषियों पर होगी कार्रवाई? यह हादसा सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है। राजू गौतम के लहू का हिसाब कौन देगा? क्या उन अधिकारियों पर गाज गिरेगी जिन्होंने तीन साल तक मरम्मत की फाइल को दबाए रखा? जनता अब जवाब चाहती है। महज प्लास्टर झाड़ देने से प्रशासन की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। खबर प्रकाशित होने के बाद अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस पर क्या कड़ा रुख अपनाता है या फिर एक और हादसे का इंतजार किया जाएगा।
आक्रोश की लहर: प्रशासन को सीधी चुनौती स्थानीय व्यापारियों और बस संचालकों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि युद्ध स्तर पर निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ, तो वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। इस घटना ने पूरे शहडोल संभाग में प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है। यह खबर उन तमाम 'सफेदपोशों' और भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक खुली चुनौती है जो जनता की जान की कीमत पर अपनी जेबें गरम कर रहे हैं। संपादकीय टिप्पणी: यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि उन सोए हुए हुक्मरानों को जगाने की एक कोशिश है, जिनके लिए कागजी कार्रवाई किसी की जान से ज्यादा कीमती है। 'दैनिक विंध्य सत्ता' इस मामले की तह तक जाएगा और जब तक न्याय नहीं मिलता, यह मुहिम जारी रहेगी।
